आक्रमणकारी विदेशज प्रजातियाँ (Invasive Alien Species)

लेखक: डॉ. अरुण कुमार मौर्य

टंकण एवं संपादन: डॉ. प्रशांत पंत

परितंत्र (Ecosystem) एक इकाई है उदहारण स्वरुप वन एवं झील, जिसमे जीवन धारण करने की क्षमता होती है. जीवन को परितंत्र में जैव-विविधता (biodiversity) के रूप में देखा जा सकता है. प्रत्येक परितंत्र एक विशिष्ट प्रकार की जैव-विविधता को धारित करता है जिसका निर्धारण उस क्षेत्र के सभी जैवीय तथा अजैवीय घटक करते हैं. जैव-विविधता का उस परितंत्र में उपस्थित सभी जैव-स्वरूपों (Life forms) के समूहन से होता है जैसे सुक्ष्मजीवाणु, कवक, जीव जंतु तथा पादप समूह आदि.

प्रत्येक परितंत्र अपने में समाहित जैव-विविधता का निर्धारण उनके बीच होने वाले अन्तार्रकर्षणों का परिणाम होता है. दूसरे शब्दों में ऐसा कह सकते हैं की उस परितंत्र में उपस्थित सभी प्रजातियाँ अंतर्राकर्षण द्वारा लगभग साम्यावस्था प्राप्त कर चुकी होती है तथा एक दुसरे विनाश के लिए तत्काल कोई खतरा नहीं उत्पन्न करती है. वर्तमान वैश्वीकरण (globalization) के दौर में बढ़ती मानवीय गतिविधियों, गमन, आर्थिक लेनदेन से अंतर्देशीय प्रजाति गमन में तीव्रता आई है. लेकिन कभी-कभी स्वजैविक आक्रमण भी उत्पन्न होता है. ऐसा प्रजाति स्वयं या अन्य जीवों (मानवीय क्रियाकलापों) के द्वारा कभी-कभी नवीन परितंत्रों में स्वयं का विस्तार करने का प्रयास करते हैं या जानबूझकर अथवा दुर्घटनावश पहुँच जाती है जहां उसकी पूर्व में उपस्थिति दर्ज नहीं थी. ऐसा आक्रमण या उपस्थिति उस परितंत्र में परिवर्तन या खतरा उत्पन्न कर देती है. ऐसे आक्रमण स्थानीय जैव विविधता के लिए बहुत बड़ा खतरा उत्पन्न करते हैं. इन प्रजातियों को आक्रमणकारी विदेशज प्रजातियाँ (Invasive Alien Species) कहा जाता है.

दूसरे शब्दों में “आक्रमणकारी विदेशज प्रजातियाँ ऐसी प्रजातियाँ हैं जो अपने प्राकृतिक आवास के परास (range) से बाहर पाए जाते है”. आक्रमणकारी प्रजातियाँ यहाँ तेज़ी से विस्तार करती है जिसके परिणामस्वरूप ये अन्य प्रजातियों, समुदायों तथा परिस्तिथिकी तंत्र के क्षति पहुंचाते हैं. स्वच्छ जल परितंत्र में मछली या जलीय खरपतवार, समुद्री तथा तटीय परितंत्र में मोलस्क एवं शैवाल तथा स्थलीय परितंत्र में घास तथा शाकीय पादप आदि आक्रमणकारी प्रजातियों के रूप में पाए जाते हैं.

भारत में आक्रमणकारी प्रजातियाँ एवं उनके द्वारा आर्थिक क्षति: एक आकलन

पुर: स्थपित (introduced) खरपतवार Damage (in US$ million)
खरपतवार
 फसलें 37.8
 चरागाह 0.92
आर्थ्रोपोडा
फसलें 16.8
पादप रोगजनक (Plant Pathogen)
फसलें 35.5
कुल 91.02
Lantana camara

चित्र 1: लैंटाना कमारा (Lantana camara)

आक्रमणकारी विदेशज प्रजातियों के गुणों के अलावा परितंत्र की दशा (ecosystem condition) भी आक्रमणकारी प्रजातियों के लिए आमंत्रण का कार्य करती है. यदि परितंत्र की दशा निम्नीकृत (degraded) या समस्याग्रस्त है तब वहां स्थानीय प्रजाति का विकास संभव नहीं हो पाता है लेकिन ऐसी दशा में विदेशज प्रजाति हेतु अधिवास (habitat) एवं विकास हेतु स्थान मिल जाता है.

परितंत्र वुलनेरबिलिटी (vulnerability) का विदेशज प्रजातियों के द्वारा आक्रमण/पुरःस्थापन में विदेशज प्रजाति के विस्तृत फैलाव, मानवीय क्रियाकलापों जैसे पर्यटन तथा अधिवास निर्माण के कारण पृथ्वी के निर्जन क्षेत्रों में समस्या उत्पन्न होना तथा संवेदी एवं निम्न जैव विविधता क्षेत्र में गड़बड़ी (जैसे मरुस्थल, लैगून) होने से परितंत्र के आक्रमण हेतु वुलनेरबिलिटी की स्थिथि उत्पन्न होती है.

भारत में आक्रमणकारी विदेशज प्रजातियों के पुरःस्थापन के कुछ उदहारण

केस अध्ययन (Case Studies)

    1. सरपेनटाइन लीफमाईनर (Liriomyza trifolii): इस कीट को भारत में लगभग 1990-91 के दौरान क्राईसेनथीमम (Chrysanthemum) की कटिंग के साथ प्रविष्ट किया गया था जिसने कई महत्त्वपूर्ण फसलों को नुक्सान पहुँचाया है.
    2. मिकानिया माइक्ररेनथा (Mikania micrantha): यह प्रजाति को लगभग 20वीं शताब्दी की शुरूआत में आयत के द्वारा पुरःस्थापित हुआ था. इसे पहले असम में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हवाई पट्टियों को ढकने के लिए उगाया जाता था लेकिन वर्तमान में यह बागानी फसलों जैसे रबर, सुपारी, चाय, केला तथा अन्नानास के लिए खतरा बन गयी है.
    3. लैंटाना कमारा (Lantana camara): यह प्रजाति भारत के विविध परितंत्र में पायी जाती है. इसे 17 से-18वीं सदी में समुंद्री यात्रा के द्वारा विश्व के अन्य भागों में सजावटी पुष्प पादप के रूप में वनस्पति उद्यानों में पुरःस्थापित किया गया था. भारत में यह 1809 में कलकत्ता के वनस्पति उद्यान में लाया गया था (चित्र 1).
    4. प्रोस्पिस जूलीफलोरा (Prosopis juliflora): यह आक्रमणकारी प्रजाति भारत में मुख्यतः मरूस्थलीय एवं अर्ध-मरूस्थलीय क्षेत्रों में सीमित है. इसे भारत में 19वी सदी के उत्तरार्ध में पुरःस्थापित किया गया था. शुष्क दशा, लवण सहनीयता तथा एलीलोपैथिक गुणों के कारण यह प्रजाति भारतीय परितंत्र में अनेक स्थानीय प्रजातियों’ को प्रतिस्थापित कर पर्यावरणीय समस्या बन गयी है (चित्र 2).
    5. कांग्रेस घास (Parthenium hysterophorous): यह आक्रमणकारी प्रजाति भारत में दुर्घटनावश अमेरिकी गेहूं को आयत करने के दौरान संदूषण के रूप में पुरःस्थापित हो गयी थी (चित्र 3).
चित्र 3: कांग्रेस घास (Parthenium hysterophorous)

चित्र 3: कांग्रेस घास (Parthenium hysterophorous)

  1. कप्पाफिकुस अल्वर्र्जीआई (Kappaphycus alvarezii): इस शेवाल से व्यापारिक स्तर पर केराजीनिन प्राप्त होता है जिसके निष्कर्षण हेतु इस प्रजाति को 1993 में पश्चिमी भारत में पुरःस्थापित किया गया था लेकिन उसके बाद यह प्रजाति तेजी से फ़ैल कर जलीय परितंत्र को क्षति पहुंचा रही है.
  2. केलोट्रोपिस प्रोसेरा (Calotropis procera): यह प्रजाति उष्ण कटिबंधीय अफ्रीका क्षेत्र से भारत में पुरःस्थापित हो गयी है (चित्र 4).
  3. आरजीमोन मेक्सीकाना (Argemone mexicana): यह प्रजाति उष्ण कटिबंधीय मध्य एवं दक्षिणी अमेरिका क्षेत्र से भारत में पुरःस्थापित हो गयी है (चित्र 5).

अन्य उदाहरण:

  1. पक्षी समूह: भारतीय मैना (चित्र 6), रेड-वेंटेड बुलबुल (चित्र 7), स्टर्लिंग (चित्र 8),
  2. मतस्य समूह: भूरा ट्राउट, एवं कार्प
  3. सरीसृप: ब्राउन ट्री स्नेक
  4. स्तनधारी समूह: स्पोटेड डियर

 

चित्र 2: प्रोस्पिस जूलीफलोरा, विलायती कीकर (Prosopis juliflora)

चित्र 2: प्रोस्पिस जूलीफलोरा, विलायती कीकर (Prosopis juliflora)

 

 

 

 

भारत में आक्रमणकारी प्रजाति

समूह कुल प्रजातियाँ विदेशज प्रजातियाँ
पादप 45000 18000
स्तनधारी 316 30
पक्षी 1221 4
सरीसृप एवं एम्फिबिया 741 कोई आंकड़ा नहीं
मत्यस (स्वच्छ जल) 2546 300
अर्थ्रोपोड़ा 54430 1100
सूक्ष्मजीवाणु कोई आंकड़ा नहीं कोई आंकड़ा नहीं

                स्रोत: डाउन टू अर्थ (फरवरी 2004)

 

 

परितंत्र की अन्य प्रक्रियाओं की तरह आक्रमणकरण भी एक प्राकृतिक प्रक्रिया है. यह परिघटना 10वां नियम (10th Rule) के अनुसार चलती है अर्थात यदि 10 पुरःस्थापित प्रजातियों में से एक प्रजाति बाद में आक्रमणकारी प्रजाति का रूप ले लेती है.

आक्रमणकारी प्रजातियों के परिणाम का निर्धारण तीन प्रमुख घटकों द्वारा होता है:

  1. आक्रमणकारी प्रजाति के गुण
  2. आक्रमणकारी क्षेत्र की वुलनेरबिलिटी
  3. परितंत्र की जटिलता
Calotropis procera

चित्र 4: केलोट्रोपिस प्रोसेरा (Calotropis procera)

आक्रमणकारी विदेशज प्रजाति के गुणों में नवीन परितंत्र में सफलता के रहस्य उसके द्वारा उत्पादित उच्च मात्रा में प्रोपग्यूल, जनन परिपक्वता हेतु छोटे विकास समय की आवश्यकता, जनन इकाईयों (जैसे बीजों) का दीर्घ सुसुप्ताकाल, दक्ष एवं लम्बी दूरी तक बीजों का वितरण तथा वायवीय एवं उप-स्थलीय जैव भार उत्पादन में छिपा रहता है. इसके अलावा ऐसी प्रजातियाँ कुछ ऐसे रसायनों का उत्पादन, धारण एवं श्रावण करती हैं जिससे उन्हें अन्य प्रजातियों के विस्तार को रोकने में सहायता मिलती है. इस प्रघटना को एलीलोपैथी (allelopathy) भी कहा जाता है. यह रणनीति पार्थिनियम (Parthenium sp.), लैंटाना या पुटूस (Lantana spp.), यूपेटोरियम (Eupatorium) में प्रमुख है. ऐसे गुणों से इन प्रजातियों को नये तथा निम्नीकृत (degraded) भू-क्षेत्रों में स्वयं को स्थापित करने में सहायता मिलती है. आक्रमणकारी विदेशज प्रजातियों में फीनोटाइप प्लास्टिसिटी (phenotype Plasticity) पाई जाती है. यह गुण उन्हें बदले हुए परिस्थिति में अनुकूलित होने में सहायता करता है. जैसे, कांग्रेस घास (Parthenium hysterophorous) मृदा की प्रकृति के अनुसार दो प्रकार की रणनीतियां अपनाता है जैसे लम्बा पादप, तीव्र वृद्धि तथा छोटा बीज भार व दूसरा छोटा पादप, उच्च बीज भार लेकिन धीमी वृद्धि. आक्रमणकारी विदेशज प्रजातियाँ अपने विस्तार के लिए वितरण (dispersal) के कई माध्यमों के सहायता लेते हैं जैसे लेंटाना प्रजाति के बीजों को फलाहारी पक्षी, भेड़, बकरी तथा बन्दर सभी वितरण में सहायता करते हैं.

चित्र 5: आरजीमोन मेक्सीकाना (Argemone mexicana)

चित्र 5: आरजीमोन मेक्सीकाना (Argemone mexicana)

इसी तरह आक्रमणकारी विदेशज प्रजातियां जनन की एक विधि पर निर्भर न रहकर वैकल्पिक तथा विविध विधियों का विकास किया है. जैसे, लैंगिक जनन (sexual reproduction) के साथ कायिक (vegetative) विधियों का उपयोग. कायिक जनन विधि मुख्यतः जलीय आक्रमणकारी प्रजातियों में दक्ष तरीके से उपयोग में लायी जाती है. जैसे जलकुम्भी (Water hyacinth or Eichhornia crasipes) में स्टोलन (stolon) की सहायता से जनन किया जाता है.

आक्रमणकारी विदेशज प्रजातियाँ परितंत्र को बहिआयामी रूप से प्रभावित करती हैं. आक्रमण के कारण परितंत्र में उपस्थित प्रजाति विविधता (species diversity) में कमी होती है. यह कमी स्थानीय प्रजाति का विदेशज प्रजाति से हुए प्रतिस्पर्धा में पराजित होने के कारण होता है. जैसे, यूकेलिप्टस में पाए जाने वाले एलीलोपैथिक गुणों के कारण उनके मूलों द्वारा श्रावित रसायन (allelochemicals) तथा पत्तियों में उपस्थित रसायन किसी अन्य प्रजाति को आस-पास वृद्धि नहीं करने देता है.

चित्र 6: कॉमन मैना

चित्र 6: कॉमन मैना

नवीन परितंत्र में आक्रमणकारी विदेशज प्रजाति के नियामक प्रजाति (regulator species) की अनुपस्थिति (जैसे कीट तथा अन्य शाकाहारी) भी उन्हें और सफल बनाते हैं. विदेशज प्रजाति की सफलता तथा स्थानीय प्रजाति का निश्कासन परितंत्र में प्रजाति सम्पन्नता (species richness) में भी कमी लाता है जिससे परितंत्र के समाप्त होने की आशंका बढ़ती है. आक्रमणकारी विदेशज प्रजातियां परितंत्र के चलायमान खाद्य श्रंखला (food chain) पर प्रभाव डालती है जिसके परिणामस्वरूप खाद्य श्रंखला में उच्च स्तर पर उपस्थित जीवों की संख्या तथा गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ता है. उदाहरणस्वरुप इमपेशेन्स ग्लैंडडुलीफ़्लोरा (Impatiens glandiflora) एक हिमालय क्षेत्री आक्रमणकारी प्रजाति है. यह प्रजाति स्थानीय प्रजाति बीटोनी (Stachys thunburgii) से ज्यादा मात्रा में मकरंद (nectar) उत्पादित करती है. परिणामस्वरूप परागणकारी जीव (pollinator) प्रथम प्रयास में ही इमपेशेन्स  (Impatiens sp.) के प्रति आकर्षित हो जातें हैं. इस विपथन (aberration) के कारण प्राकृतिक खाद्य श्रंखला में बाधा उत्पन्न होती है जो उसके आगे के चरण पर दुष्प्रभाव डालती है.

आक्रमणकारी विदेशज प्रजातियाँ परितंत्र के जैव भू-रासयानिक चक्र (bio-geochemical cycles) या पोषक तत्वों के चक्र (nutrient cycles) पर प्रभाव डालती है. उदाहरणस्वरुप जब एकेसिया प्रजाति आक्रमण कर जब किसी क्षेत्र में स्थापित हो जाती है तब इस प्रजाति द्वारा उच्च मात्रा में नाइट्रोजन स्थिरीकरण किया जाता है. इससे स्थानीय मृदा में नाइट्रोजन की मात्रा में वृद्धि हो जाती है.

चित्र 7: रेड-वेंटेड बुलबुल

चित्र 7: रेड-वेंटेड बुलबुल

जैव रासायनिक चक्र में जल एक महत्त्वपूर्ण अवयव है जो अन्य घटकों के चक्रण में सहायता करती है. आक्रमणकारी विदेशज प्रजातियाँ अपने गुणों से किसी क्षेत्र की जल धारिता को प्रभावित कर देती है.  दक्षिण अफ्रीका में पाया जाने वाली विदेशज प्रजाति हकिया (Hakia sp.) के द्वारा उच्च मात्रा में जलाप्रयोग के कारण उस क्षेत्र में जल की उच्च मात्रा में ह्रास हुआ है.  आक्रमणकारी विदेशज प्रजाति के पत्ती एवं ताने में आगनुरागी (fire loving) रसायनों  की उपस्थिति के कारण आग लगने की घटना में वृद्धि हुई है. उदहारणस्वरुप चीट घास (Bromus tactorum) के कारण पश्चिमी उत्तर अमेरिका में आग की घटनाओं में काफी वृद्धि हुई है.

आक्रमणकारी विदेशज प्रजातियाँ की रोकथाम तथा उपशमन-

आक्रमणकारी विदेशज प्रजातियाँ की विस्तार को रोकने हेतु निम्न प्रयास किए जातें हैं-

  1. उन्मूलन (Eradication)
  2. बाड़बंदी (Containment)
  3. रोकथाम (Prevention)
  4. एकीकृत खरपतवार प्रबंधन (Integrated Weed Management)

उन्मूलन के अंतर्गत किसी एक क्षेत्र में उपस्थित आक्रमणकारी विदेशज प्रजातियाँ को परितंत्र से सदैव के लिए  समाप्त कर दिया जाता है. इसमें पादपों को जलाना एक प्रमुख उपाय है कभी-कभी आक्रमणकारी विदेशज प्रजातियाँ उन्मूलन हेतु रसायनों का उपयोग किया हटा है लेकिन इन रसायनों का जैव-विघटनीय (biodegradable) होना एक प्राथमिक शर्त होती है. जैविक नियंत्रण के अंतर्गत आक्रमणकारी विदेशज प्रजातियाँ को निष्कासित करने हेतु उन प्रजातियों के प्राकृतिक भक्षकों का उपयोग किया जाता है उदाहरणस्वरुप जलकुम्भी, सल्विनिया मोलेस्टा (Salvinia molesta) और पिस्टिया के प्राकृतिक नियंत्रण हेतु उनके प्राकृतिक क्षेत्र से घुन प्रजातियो को उनके जैव-नियंत्रण हेतु लाया गया है. इसके अलावा आक्रमणकारी प्रजातियों से मुक्ति पाने के लिए जनशिक्षा (Public awareness) तथा लोक-भागीदारी (people’s participation) पर बल दिया जाता है. एकीकृत खरपतवार प्रबंधन के अंतर्गत आक्रमणकारी विदेशज प्रजातियों के रोकथाम के लिए आर्थिक रूप से वहनीय अनेक विधियों के मिश्रण को उपयोग में लाया जाता है जैसे जैव-नियंत्रण, खरपतवारनाशी तथा भौतिक नियंत्रण विधियां.

चित्र 8: स्टर्लिंग

चित्र 8: स्टर्लिंग

आक्रमणकारी प्रजाति के प्रसार की रोकथाम हेतु राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय प्रयास:

यद्यपि आक्रमणकारी प्रजाति भी जैव विविधता का ही भाग है लेकिन इसके दुष्प्रभाव को देखते हुए राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसके रोकथाम हेतु निम्न कदम उठाये गए हैं:

  1. जैव विविधता सम्मेलन (biodiversity convention): यह सम्मेलन 1992 में पृथ्वी शिखर वार्ता के समानांतर संपन्न हुआ था. यह सम्मेलन आक्रमणकारी प्रजातियों को एक वैश्विक चुनौती के रूप में स्वीकर करता है तथा उससे निपटने के लिये, सम्मलेन के बाद स्वीकृत अंतर्राष्ट्रीय संधि के अन्नुच्छेद 8(h) में सदस्य राष्ट्रों को आक्रमणकारी प्रजाति के पुरःस्थापन, नियंत्रण या उन्मूलन पर जोर देता है जो परितंत्र के लिए खतरा है. भारत ने राष्ट्रीय स्तर पर इस संधि शर्तों को परिचालित करवाने हेतु जैव विविधता अधिनियम, 2002 को अधिनियमित किया है.
  2. ग्लोबल इनवेसिव स्पीशीज प्रोग्राम (Global invasive species Program, GISP): इस कार्यक्रम की स्थापना सन 1977 में एक गैर लाभ-भागीदारी के रूप में हुई जिसका प्रमुख उद्द्येश्य आक्रमणकारी प्रजाति से उत्पन्न हुए भय से निपटना था. एक आकलन के अनुसार वैश्विक स्तर पर आक्रमणकारी प्रजातियों द्वारा लगभग 1.4 ख़रब अमेरिकी डालर के बराबर वार्षिक नुक्सान होता है. इसका प्रमुख कार्य नीति निर्माण, सह्योग, विशेष तौर पर जैव विविधता सम्मलेन अनुच्छेद 8(h) के अनुसार बनी संधियों में वरदान करना है तथा इससे सम्बंधित जागरूकता फैलाना है ताकि जैव विविधता संरक्षण परितंत्र सुरक्षा के साथ मानवीय आजीविका को संधारित (sustain) किया जा सके.
  3. इनवेसिव स्पीशीज स्पेसिलिस्ट ग्रुप (Invasive Species Specialist Group): यह समूह स्पीशीज सर्वाइवल कमीशन (species survival commission) का एक हिस्सा है जिसका प्रमुख कार्य आक्रमणकारी प्रजातियों के पुरःस्थापन, रोकथाम तथा उन्मूलन के तरीकों को सुझाना तथा जागरूकता प्रसार करना है.
  4. बोटैनिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (Botanical Survey of India, BSI): यह संस्था भारत में उपस्थित आक्रमणकारी विदेशज प्रजातियों की सूची निर्मित करता है जिसका उपयोग अध्ययन, अनुसंधान तथा नीत्ति-निर्माण तथा जागरूकता प्रसार में किया जाता है.
  5. प्लांट क्वारंटाइन (रेगुलेशन ऑफ़ इम्पोर्ट इन्टू इंडिया) आर्डर 2003, Plant Quarantine (Regulation of Import into India) Order 2003: इस आर्डर के द्वारा सरकार आयातित बीजों, पादपों तथा पादप उत्पादों, जिनके साथ आक्रमणकारी प्रजातियाँ भारत में प्रविष्ट हो सकती है, विनियमन करने का प्रयास किया जाता है. भारत सरकार ने आयातित उत्पाद या नये उत्पाद हेतु एक अनिवार्य वैधानिक खरपतवार जोखिम विश्लेषण का उपबंध किया है.

Bibliography

  1. http://www.diversitas-international.org/activities/past-projects/global-invasive-species-programme-gisp accessed on 15/04/2016.
  2. https://www.cbd.int/decision/cop/?id=7750 accessed on 15/04/2016.
  3. http://www.iucn.org/about/work/programmes/species/our_work/invasive_species/ accessed on 15/04/2016.
  4. http://www.bsienvis.nic.in/Database/Invasive_Alien_species_15896.aspx accessed on 15/04/2016
  5. http://www.frontline.in/static/html/fl2613/stories/20090703261306500.htm accessed on 15/04/2016.
  6. https://www.cbd.int/invasive/WhatareIAS.shtml accessed on 15/04/2016.
  7. http://www.downtoearth.org.in/coverage/invasive-alien-species-10861 accessed on 15/04/2016.
  8. Wardle DA. Bardget, RD. Callaway, RM. Van der Puten WH. 2011. Territorial ecosystem responses to species gains and losses. Science. 332: 1273-77.
  9. Kilpatrick AM. 2011. Globalization, Land use, and the Invasion of West Nile Virus. Science. 334: 323-27.
  10. Singh JS. Singh SP. Gupta S.R. 2006. Ecology Environment and Resource Conservation. First Edition, Anamaya publication, New Delhi.

 

Dr. Arun Kumar Maurya

डॉ. अरुण कुमार मौर्य, एक शिक्षक, शोधकर्ता और लेखक के रूप में दयाल सिंह कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं. डॉ. मौर्य ने पादप कार्यिकी एवं जैव-रसायन में विशेषज्ञता के साथ वनस्पति विज्ञान में एम.फिल और पीएचडी प्राप्त किया है. वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय में विधि स्नातकोत्तर में अध्ययनरत हैं. उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय से बौद्धिक संपदा अधिकार कानून (PGDIPRL) (एनएलएसआइयू), बंगलौर से एक डिप्लोमा भी अर्जित किया है. वे एक उत्साही वन्य जीव फोटोग्राफर भी हैं तथा उन्होंने इस सम्न्बंध में कई लेख लिखे हैं.

5 Comments

  1. Dr. Prashant Pant

    Dr. Prashant Pant

    April 20, 2016 at 8:15 pm

    an enlightening article sir. I have one question though, a bee is seen hovering over flowers of Lanatana. Alien species conceptually don’t take part in ecosystem services or broadly speaking, don’t interact with the local diversity in a positive manner. so is this hover incidental or is it that Bees have found a new nectar source?

  2. Arun

    April 21, 2016 at 4:36 pm

    The above picture is taken by me so as it is seen bees are hoovering and using some nectar as energy source and doing this they are transferring pollens. As a experience in India during photo-shoot I have observed bees & butterflies are much attracted where L. camara is growing.
    I wanted to substantiate with some citation which I am unable to paste the link on this section !

    • Dr. Prashant Pant

      Dr. Prashant Pant

      April 21, 2016 at 5:33 pm

      Okay. Probably you should compile another article on interactions of pollinators with Alien species..It will be very interesting to see what are world wide trends.

  3. Vineet Singh

    April 21, 2016 at 5:18 pm

    Dear Sir..i think this is the crux for invasion they have ability to attract generalist pollinators like bees, flies and butterflies. Most of the invasive species are robust and produce large number of flowers they generally create a problem for endemic species causing pollinator limitation to them. As foragers found a new more robust kind of nectar source they generally tend to avoid competition from limited resource provided by endemic ones….hence posing a bigger threat to biodiversity as rightly explained by arun sir…

    • Dr. Prashant Pant

      Dr. Prashant Pant

      April 21, 2016 at 5:30 pm

      Very Intriguing!. thanks Vineet

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