आवृतबीजी जातिवृत्त समूह तंत्र (Angiosperm Phylogeny Group System)

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लेखक: डॉ. आनंद सोनकर
अनुवाद, टंकण एवं संपादन: डॉ. अरुण कुमार मौर्य एवं डॉ. प्रशांत पंत

 

वर्गीकरण शब्द की उत्पत्ति ग्रीक शब्द टेक्सिस (taxis) एवं नोमोस (nomous) से हुई है, जिसका तात्पर्य क्रमशः व्यवस्था (arrangement) तथा विधि होता है. वर्गीकरण (taxonomy) विज्ञान एक पूर्व निर्धारित वर्गीकरण विधि नियम के अनुसार जीवों का वर्णन, पहचान, नामकरण तथा वर्गीकृत करने का कार्य करता है. आवृत्तबीजी पौधों (Angiosperms) के वर्गीकरण की यात्रा बड़ी लम्बी है जिसने अपने विकास के क्रम में अनेकों वर्गीकरण के तरीकों को जन्म दिया है. इसकी शुरुआत बहुत पहले पादपों के आकारिकी (morphology) को देखकर तथा उनके बीच समानता का सम्बन्ध स्थापित कर वर्गीकरण किये जाने से लेकर वर्तमान काल के जीनोम (genome) के आँकडों से प्राप्त आधारों से किया जाता है. आवृतबीजी पादपों का वर्गीकरण अलग-अलग आधारों पर कृत्रिम, प्राकृतिक तथा जातिवृत्तीय (phylogenetic) वर्गीकरण के प्रकार में बांटा गया है.

कृत्रिम वर्गीकरण के अंतर्गत आसानी से देखे जाने वाले लक्षणों को लिया गया था. लेकिन इसमें उपयोग में लाये गए लक्षणों को मनमानी (arbitrary) ढंग से लिया गया था. जैसे लीनियस (Linnaeus) के द्वारा दिया गया वर्गीकरण का लैंगिक तंत्र केवल पुंकेसरों की संख्या के आधार पर किया गया है. प्राकृतिक वर्गीकरण तंत्र एक वैज्ञानिक वर्गीकरण का प्रकार है जिसमे लक्षणों को महत्व के आधार पर चयनित किया जाता है. उदहारण के लिए जॉर्ज बेन्थम एवं सर जे. डी. हूकर (George Bentham and Sir J.D. Hooker) का वर्गीकरण (1862-1863) एवं डी.जस्सू (de Jussieu) का वर्गीकरण (1789). जातिवृतीय तंत्र एक समूह की वंशावली (lineage) पर आधारित है. एक समूह के सदस्यों के आपसी सम्बन्ध को एक साझे पूर्वज (single common ancestor) से एक क्लेड (clade) के रूप में दर्शाया जाता है. इसका विश्लेषण एवं चित्रीय निरूपण क्लेडोग्राम (Cladogram) या फायलोग्राम (Phylogram) के  रूप में देखा जाता है.

समय के साथ, कई प्रकार के वर्गीकरण आयें है जिसमे जातिवृतीय संकल्पना को एक या दूसरे प्रकार से अनुसरित किया गया है. इसकी शुरुआत को 1893 से माना जा सकता है, जब इस वर्गीकरण का विकास हुआ, इनमें कुछ मुख्य नाम हैं:- ए. डब्लू. आइशलर (A.W.Eichler), एडोल्फ एंग्लर (Adolf Engler), कार्ल प्रन्टेल (Carl Prantl) (1887-1915), चार्ल्स बेस्सी (Charles Bessey), जॉन हचिन्सन (John Hutchinson), आरमन तख्ताजान (Armen Takhtajan), आर्थर क्रोन्क़ुइस्ट (Arthur Cronquist) (1988), रॉल्फ  डालग्रेन (Rolf Dahlgren), रोबर्ट ऍफ़. थोर्न (Robert F. Thorn)  (2007) तथा आवृतबीजी जातिवृतीय समूह (Angiosperm Phylogeny Group; APG) जैसे वर्गीकरण तंत्र प्रमुख है.

आवृतबीजी जातिवृतीय समूह (APG) के आगमन से पूर्व यह स्पष्ट हो चुका था कि पहले तथा वर्तमान में वर्गीकरण की प्रजातियाँ स्पष्ट रूप से पुष्पीय पादपों के जातिवृतीय संबंधों को नहीं दर्शाते है. ऐसे वर्गीकरण प्रणालियों को संप्रेषित करना भी मुश्किल हो गया. इन सभी समस्याओं को समाप्त करने के लिए पुष्पीय पादपों  के वर्गीकरण का नयी विधि तंत्र का विकास किया गया जिसे आवृतबीजी जातिवृतीय समूह (APG) कहा गया.

आवृतबीजी जातिवृतीय समूह (APG) वर्गीकरण एक समावेशी (inclusive) वर्गीकरण नहीं है. यह केवल कुलों तथा आर्डर तक वर्गीकरण प्रदान करते हैं लेकिन यह आज तक का इकलौता वर्गीकरण तंत्र है जो पूर्णतः जातिवृतीय आँकडों पर आधारित है. आवृतबीजी जातिवृतीय समूह (APG) कुछ हद तक असामान्य वर्गीकरण भी है क्योंकि यह संपूर्ण स्रोतों से प्राप्त आँकडों पर आधारित न होकर केवल तीन जीन फैमिली के डी.एन.ए क्रम  के क्लाडीस्टिक विश्लेषण (Cladistic Analysis) पर आधारित है. तीन जीन में से दो जीन हरितलवक (Chloroplast) तथा एक जीन जो राइबोसोम्स (Ribosomes) को कोड करता है, लिया गया है. यद्यपि आवृतबीजी जातिवृतीय समूह (APG) केवल आँकडों, प्रमाणों पर आधारित है, इनके सहयोगी समूह को अन्य प्रमाणों से भी समर्थित किया गया है. उपरोक्त जीनों को वर्गीकरण के आधार के रूप में सम्मिलित करने का प्रमुख कारण इन जीनों का संबंधित क्षेत्र तथा उद्धविकास के दौरान ज्यादा परिवर्तन को न दिखलाना है.

आवृतबीजी जातिवृतीय समूह (APG) में किसी भी आर्डर को मिलाया या तोडा नहीं गया है और किसी भी कुल को एक आर्डर से दुसरे आर्डर में स्थानांतरित भी नहीं किया गया. केवल एक केस में एक कुल को आवृतबीजी जातिवृतीय समूह (APG) के एक आर्डर  से निष्कासित किया गया है जैसे गेरीएल्स (Garryales) से ओंकोथीकेसी (Oncothecaceae) को निकाला गया तथा इसे यूएसटेरोइड (Euasteroid) के शुरूआती  स्थान  में रखा गया है. इसका ऐसा पुनर्स्थापन इसलिए किया गया गया है क्योंकि इसका वर्तमान विश्लेषण स्पष्ट स्थिति को समझने में असफल है, जिसमें बूटस्ट्रेपिंग (bootstrapping) और जैकनाइफ (Jacknife) समर्थित विधियों का भी उपयोग  किया गया है (APG II, 2003). इस तरह आवृतबीजी जातिवृतीय समूह (APG) तंत्र के द्वारा आर्डरों के बीच तथा कुछ असम्बंधित कुलों के बीच अंतरसम्बन्ध को समझने में बेहतरी हुई.

आवृतबीजी जातिवृतीय समूह-II (APG II) वर्गीकरण तंत्र को वैकल्पिक सीमा-निर्धारण नियमन (circumscription) तथा ब्रैकेटेड तंत्र जैसी सुविधा को आम सहमति जुटाने में सहायता मिली. वास्तव में, आवृतबीजी जातिवृतीय समूह (APG) संकलनकर्ताओं को उपयोगकर्ताओं के द्वारा बहुत सी नकारात्मक प्रतिक्रियाएं भी मिली और बहुतों ने तो ब्रैकेटेड सिस्टम को स्वीकार भी नहीं किया. इसके कारण आवृतबीजी जातिवृतीय समूह-III (APG III; 2009) में ब्रैकेटेड सिस्टम को पूर्णतः हटा दिया गया तथा अधिकाँश केसों  में ब्रेकेटिंग (bracketing) तंत्र के विस्तृत सीमा-निर्धारण नियमन (circumscription) के नियम को स्वीकार किया गया. इससे आवृतबीजी जातिवृतीय समूह-III (APG III) के  भारी भरकम दृष्टिकोण को सरल बनाने का प्रयास किया गया, जिसके परिणामस्वरूप अधिकाँश लोगों से इस वर्गीकरण को लेकर समर्थन मिला है. इसके लिए वर्गीकरण वैज्ञानिक तथा उपयोगकर्ता से विस्तृत बनाम संकीर्ण सीमा-निर्धारण नियमन के लिए आवृतबीजी जातिवृतीय समूह (APG) का ऑनलाइन सर्वेक्षण अगस्त 2015 में शुरू किया गया था.

पहले आवृतबीजी जातिवृतीय समूह-I (APG I) वर्गीकरण के समय से आवृतबीजी पादपों के कई अनसुलझे संबंधों को सुझाया गया है. 1998 में आवृतबीजी जातिवृतीय समूह (APG) का संशोधन सुप्राफेमिलिअल (Suprafamillial) वर्गीकरण प्रस्तुत किया गया. इसमें पुष्पीय पादपों के 462 कुलों को 40 संभावित (Putative) एकजातीयवृत्त आर्डर एवं एक छोटी अनौपचारिक एकजातिवृतीय समूह में विभाजित किया गया है. आवृतबीजी जातिवृतीय समूह (APG) के ऐसे वर्गीकरण से वर्गिकी (systematics) के क्षेत्र मे कार्यरत लोगों को बहुत आराम मिला क्योंकि आवृतबीजी जातिवृतीय समूह (APG) के पहले के जातिवृतीय वर्गीकरणों में अनेक भ्रम (confusion) भरे हुए थे. इस वर्गीकरण तंत्र की सबसे बड़ी कमी यह थी की इसमें 25 कुलों की एक अतिरिक्त सूची उपलब्ध थी जिसमे सुदृढ़ आकडें न होने के कारण उनकी स्थिति अनिश्चित थी. इसके अलावा इस वर्गीकरण में मुख्य बिंदु (Nodes) नाम-विहीन था या उसको अनौपचारिक नाम दिया गया था, जैसेकि कॉम्मेलीनोइदेस (Commelinoids), कोर यूडाएकोट्स (core Eudicots), रोसिड्स (Rosids) आदि. इसमें से कुछ समस्याओं का निदान 2003 में आये आवृतबीजी जातिवृतीय समूह–III (APG III) में किया गया. आवृतबीजी जातिवृतीय समूह-III (APG III) के प्रकाशन में अनेक समस्याओं का हल दिया गया था. पांच अतिरिक्त ऑर्डर्स को पहचाना गया, जैसे कि ओस्ट्रेलोबेलिएल्स, केनेलेल्स, सीलैस्त्रल्स, क्रोसोमेंटेल्स एवं गंनेरेल्स (Australobaileyales, Canellales, Celastrales, Crossomatales and Gunnerales). यह सब 1998 के आवृतबीजी जातिवृतीय समूह (APG) के अवर्गीकृत एक जातिवृतीय एक कुल-समूह का प्रतिनिधित्व करती थी. वहीँ दूसरी ओर कुछ आर्डरो की परिधि को बढाया गया ताकि वे अपने बहन-समूहों (sister groups) को आत्मसात कर सकें जैसे  डीपसेकेल्स (Dipsacales) में एडोक्स्ससी (Adoxaceae) को शामिल किया गया.

वेहलिएल्स (Vahlialis), मेतेनियूँसीएल्स (Metteniusiales), बोराजीनेल्स (Boraginales), दिल्लेनिएल्स (Dilleniales), इकेसीनेल्स (Ieacinales) जैसे आवृतबीजी जातिवृतीय समूह-IV (APG IV; 2006) में आये अनेक नये आर्डरों को पहचाना गया है, जिसके परिणामस्वरूप आर्डरों एवं कुलों की कुल संख्या 64 एवं 416 हो गयी है (चित्र 1; स्रोत: APG IV). सुपरोसिड्स (superrosids) और सुपरएस्टेरिड्स (superasterids) जैसे दो अनौपचारिक क्लेड को भी प्रस्तावित किया गया है. प्रत्येक के अंतर्गत अतिरिक्त आर्डरों को समावेशित किया गया है जिसमे रोसिड्स एवं एसटीरीड्स (rosids and asterids) की प्रभाविता है.

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चित्र 1: आर्डर तथा कुलों के अंतर्संबंध को दर्शाता आवृतबीजी जातिवृत समूह तंत्र IV (स्रोत: APG IV, 2016)

ऐसा कुल जो संभवतः एक कुलीय आर्डर से निर्मित थे जैसे डेसीपोगोनेसी (Dasypogonaceae) और सबिएसी को क्रमशः ऐरीकेल्स तथा प्रोटीएल्स में डाला गया है. दो परजीवी कुल जिनका स्थान अनिश्चित था अब उन्हें समुचित स्थान दिया गया है.  जैसे साइनोमोरिऐसी (Cyanomoriaceae) को सक्सिफ्रागालेस (Saxifragales) में, तथा एपोडेनथेसी (Apodanthaceae) को कुकुरबीटेल्स (Cucurbitales) में. यद्यपि अब कुछ प्रमाण है कि जिन कुलों को आवृतबीजी जातिवृतीय समूह (APG III)  में एक जातिवृत्तीय माना गया था अब वे नहीं है तथा डायस्कोरियेल्स (Dioscoreales) तथा सेनाटाल्स (Sanatales) को आवृतबीजी जातिवृतीय समूह-III (APG III) में परिवर्तित नहीं किया गया है तथा लेमिएल्स के कुछ जेनेरा जैसे पेलेतेंथेरा (Peletenthera) को सही स्थान नहीं मिल पाया है. कुलों के सीमा-नियमन निर्धारण में परिवर्तन एवं पहचान आवृतबीजी जातिवृतीय समूह-III (APG III) के प्रकाशन के बाद नये परिणामों की प्राप्ति के आधार पर किया गया है.

वृहद् रूप से देखें तो APG IV में APG III से थोडा सा ही परिवर्तन है. APG IV में न्यूनतम स्थायित्व जैसे आयाम को प्राथमिकता दी गयी है. आवृतबीजी जातिवृतीय समूह (APG) तंत्र अपने शुरुआत से आज तक लगभग सतत बना हुआ है तथा बहुत थोडा सा परिवर्तन को बचा रहा है. यद्यपि कुलों के सीमा विस्तार नियमन निर्धारित तथा पुनर्संगठन चलता रहेगा, विशेषकर केरियोफीलाल्स (Caryophyllales), लेमिएल्स (Lamiales), एवं सेंटानेल्स (Santanales). इन समूहों के लिए और मजबूत आकंड़ों की आवश्यकता है जो जेनेरिक तथा कुलों के बीच सम्बन्ध दर्शा सकें. प्लास्टिड जीनोम (Plastid Genome) तथा क्रेन्दक जीनों की पूर्ण सिक्वेंसिंग के द्वारा ही पूर्ण हल प्राप्त किया जा सकता है. जैसे कि पूर्व भिन्न दिशागामी (Early Diverging) Lamiids में किया गया है. कुछ कुलों जैसे किवासी (Kewaceae), मकराथ्रूएसी (Macrathruiaceae), माइक्रोटियासी (Microteaceae) और  पेटेनेसी (Petenaceae) कुछ नये कुलों में जातिवृतीय अध्ययन के बाद विवरण की आवश्यकता उत्पन्न हो सकती है. इन नवीन  आँकडों के प्राप्त होने पर APG तंत्र में भविष्य में परिवर्तन की आवश्यकता पड़ेगी.

 

References:

  1. APG. 1998. An ordinal classification for the families of flowering plants. Ann. Missouri Bot. Gard.85: 531-553.
  2. APG II. 2003. An update of the Angiosperm Phylogeny Group classification for the orders and families of flowering plants: APG II.  J. Linnean Soc.141: 399-436.
  3. APG III. 2009. An update of the Angiosperm Phylogeny Group classification for the orders and families of flowering plants: APG III.  J. Linnean Soc.161: 105-121.
  4. APG IV. 2016. An update of the Angiosperm Phylogeny Group classification for the orders and families of flowering plants: APG IV.  J. Linnean Soc. 181: 1–20.
  5. Chase MW, Reveal JL. 2009. A phylogenetic classification of the land plants to accompany APG III. Botanical Journal of the Linnean Society, 161: 122–127.
  6. Christenhusz MJM, Vorontsova MS, Fay MF, Chase MW. 2015. Results from an online survey of family delimitation in angiosperms and ferns: recommendations to the Angiosperm Phylogeny Group for thorny problems in plant classification. Botanical Journal of the Linnnean Society 178: 501–528
  7. Wearn JA, Chase MW, Mabberley DJ, Couch C. 2013. Utilizing a phylogenetic plant classification in systematic arrangements in botanic gardens and herbaria. 172: 127–141.

 

 

 

Dr. Anand Sonkar
डॉ आनंद सोनकर सहायक प्रोफेसर, वनस्पति विज्ञान विभाग, हंसराज कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी Anand Sonkar has pursued his B.Sc. (H) and M.Sc. in Botany from Hans Raj College, University of Delhi, Delhi in year 2000 and 2002 respectively. He has spent around six years researching on Trees of Delhi.

1 Comment

  1. Arun

    April 20, 2016 at 2:55 am

    Nice & informative article Dr Anand!

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