शकरखोरा-प्रकृति का एक गहना (Sunbird: Nature’s Jewel)

chitr2

अनुवाद, टंकण एवं संपादन: डॉ. अरुण कुमार मौर्य एवं डॉ. प्रशांत पंत

प्रातःकाल में जब हम एक हरे-भरे क्षेत्र से गुजरते हैं, तब अक्सर कुछ पक्षियों की चहचाहट तथा उड़ान को नज़रंदाज़ कर देते हैं. ऐसे पक्षियों की गतिमानता ताज़े मकरंद (nectar) या भोजन की तलाश के कारण होती है, जो पुष्पों के मकरंद ग्रंथि (nectar gland) से श्रावित होता है. छोटे आकर के पक्षियों के समूह में शकरखोरा (sunbird) एक महत्त्वपूर्ण उदहारण है, जिसे पुराने विश्व (old world) का गहना समझा जाता है. शकरखोरा तथा मकड़ी शिकारी पक्षी समूह दोनों मिलकर एक मकरंद चूसने वाले पक्षी कुल (family) का निर्माण करते हैं जिन्हें नेक्टरिनीडी (Nectariniidae) में रखा गया है. इस समूह का विस्तार विश्वस्तर तक है, जिसमे 132 जेनरा (genera) शामिल किए गए हैं. इनमे से 15 जेनरा पुराने विश्व के विषवतीय क्षेत्र (एशिया, अफ्रीका एवं ऑस्ट्रेलिया) में पाए जातें हैं.

सामान्यतः शकरखोरा प्रजाति के पंख बड़े मनमोहक होते हैं. इनमे एक नुकीला, तीक्ष्ण वक्रीय चोंच उपस्थित होती है (चित्र 1).

chitr1

चित्र 1: लम्बी, वक्रित चोच युक्त नर शकरखोरा (स्रोत: http://www.rhythmofnature.org/2013/10/lotens-sunbird-male.html)

चोंच के इस प्रकार विकसित होने का कारण इस पक्षी के मकरंद पर निर्भर होना है. इससे वह पाईपनुमा पुष्पों से मकरंद निष्कासित कर सकता है. लेकिन बच्चों को भोजन कराते समय शकरखोरा कीटों को भी भोजन हेतु प्रयोग में लाता है.

chitr2

चित्र 2: नर (बायें) एवं मादा (दायें) शकरखोरा (Cinnhyris asiaticus). Photo Credit: Dr. Vineet Singh

chitr3

चित्र 3: एक्लिप्स काल में पंखों में होने वाले परिवर्तन को दर्शाता युवा नर शकरखोरा. (Photo Credit: Dr. Arun Kumar Maurya)

सामान्यतः शकरखोरा प्रजाति एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष तक जाते हुए एक उच्च स्वरमान (pitch) की ध्वनि उत्पन्न करते हैं. शकरखोरा प्रजाति लैंगिक द्विरूप्ता द्विरूप्ता (sexual dimorphism) को दर्शाता है. नर सामान्यतः चटक रंग के, जबकि मादा शरकरखोरा धूसर रंग का होता है(चित्र 2) . नर बच्चे युवावस्था में धूसर रंग के होते है (चित्र 3) लेकिन विकास के साथ धूसर पंख झड जातें हैं तथा वह चटक इन्द्रधनुषी रंग का हो जाता है. इस माध्यमिक समय को “एक्लिप्स काल” (Eclipse Period) कहते हैं. यह प्रजाति गर्म रेगिस्तान, पर्वतीय क्षेत्र, तथा विषवतीय वन क्षेत्र में वितरण दर्शातें हैं. ऐसा विस्तृत वितरण विभिन्न जलवायु तथा तापमान परासों में उच्च लोचनीयता दर्शाए जाने के कारण संभव होता है. शकरखोरा प्रजाति को हमिंग बर्ड (humming bird) के साथ कई बार संबंधी समझ लिया जाता है जबकि शकरखोरा प्रजाति, हमिंग बर्ड के मंडराने (hovering) की क्रियाविधि के विपरीत किसी शाखा या पुष्पीय भागों पर बैठ कर मकरंद निष्कर्सित करता है. वहीँ दूसरी ओर, हमिंग बर्ड पश्चगामी उड़ान (Backward flight) भर सकती है जबकि शकरखोरा ऐसा नहीं कर सकता. यह दोनों पक्षी अपने छोटे शरीर आकार तथा मकरंद (भोजन) ग्रहण करने की कार्यविधि के कारण समानता रखते है. शकरखोरा प्रजाति न केवल देखने में मनोरम होता है बल्कि यह परागण जैसे महत्वपूर्ण कार्य को भी संपन्न करता है. शकरखोरा प्रजाति अन्य पादप प्रजातियों के साथ अंतराकर्षण (interaction) करता है जो इससे पारितोषिक के रूप में मकरंद प्रदान करते हैं.

शकरखोरा पक्षी सामान्यतः चटक लाल, नारंगी रंग तथा पीले रंग के पुष्पों (जैसे कनेर, अमलताश आदि) से मकरंद प्राप्त करते हैं. शकरखोरा से परागित (pollinated) होने वाले गंधविहीन लाल रंग के पुष्पों में सामान्यतः उच्च मात्रा में तनु मकरंद (dilute nectar) उत्पादित होता है जो यह दर्शाता है कि ऐसे पादप प्रजाति शकरखोरा प्रजाति के साथ सह-विकसित (co-evolved) हुए हैं. अतःएव शकरखोरा प्रजाति सामान्य पुष्पों वाली प्रजाति के साथ मिलकर अंतराकर्षित नहीं करते हैं. अनुकूलन तथा उच्च परस्पर अंतराकर्षण के कारण शकरखोरा प्रजाति एक विश्वसनीय परागणकारी है. यह प्रजाति सामान्यतः कई पुष्पीय प्रजातियों पर गमन करता है. इस गमन तथा पुनरागमन के कारण इनकी काफी उर्जा खर्च होती है जिसकी प्राप्ति हेतु इन्हें उच्च मात्र में मकरंद प्राप्त करते रहना पड़ता है. शकरखोरा एक सीमा-क्षेत्रीय (territorial) पक्षी समूह है तथा अपनी सीमा-क्षेत्र के निर्धारण तथा सुरक्षा हेतु अपने ही समूह के अन्य सदस्यों के साथ आक्रामक व्यवहार दर्शातें हैं.

सामान्यतः एक समूह सीमा के अन्दर दो से तीन नर तथा कुछ मादाएं शामिल होती हैं. इनका एक समूह लगातार अपनी सीमा-क्षेत्र में उपस्थित मकरंद कानिरंतर निष्कर्षण तथा उपयोग करता रहता है ताकि उसके क्षेत्र में कोई और नर प्रवेश न कर सके. परागण की प्रक्रिया में पक्षियों, जैसे शकरखोरा ज्यादा लाभकारी है क्योंकि यह परगणकारी (pollinator) ज्यादा परागकणों को लम्बी दूरी तक प्रसारित (dispersal) कर सकते हैं. वहीं दूसरी ओर, मधुमक्खियों के द्वारा केवल छोटी दूरी तक ही परागण एवं प्रसार होता है. इस तरह पक्षी आधारित परागण किसी जनसंख्या के विषमलक्षणी (heterogenous) बनाने में उच्च सहायता करता है.

भारत में पाया जाने वाला शकरखोरा (Cinnyris asiaticus) जोकि पहले Noctarina asiaticus के नाम से जाना जाता था, अनेक कुंजीशिला (keystone) प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण परागणकारी की भूमिका का निर्वाह करता है. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो शकरखोरा अनेक पादप प्रजातियों में परागकणों के स्थानांतरण तथा बीजों एवं फलों के निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है. यह ढाक (Butea monosperma), बबूल (Acacia sp.), जंगली बादाम (Sterculia sp.), गमारी (Gmelina arborea), Dendropthae sp. एवं Woodfordia sp., का प्रमुख परागणकारी है. कभी-कभी शकरखोरा अवसरवादी रणनीति अपनाता है तथा मकरंद की प्राप्ति हेतु दलपुंज (petals) के आधार में छिद्र बनाकर मकरंद चुरा लेता है. ऐसे व्यवहार को जिसमे शकरखोरा मकरंद का अवैध निष्कर्षण करता है, मकरंद लूट (nectar robbing) कहा जाता है.

यद्यपि शकरखोरा भारत में नाना प्रकार के पादप प्रजातियों में परागण के लिए जिम्मेदार है लेकिन इसके इस योगदान पर भारत में बहुत कम वैज्ञानिक अध्ययन किए गए हैं. यह पक्षी उन दुर्लभ पादपों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, जिनमें पादप परागण हेतु पूर्णतः एक परागणकारी पर ही जैसे कि शकरखोरा, पर निर्भर रहतें हैं. अतः ऐसे पादप एवं परागणकारी के बीच संबंधों की वैज्ञानिक जानकारी अतिमहत्वपूर्ण है ताकि दुर्लभ पादपों को विलुप्त (extinct) होने से बचाया जा सके. भारत में विशिष्ट रूप से मरूस्थलीय एवं अर्धमरूस्थलीय क्षेत्रों में आवास विखंडन (habitat fragmentation) के कारण पक्षियों के ऐसे जाति प्रजाति समूह विलुप्तता के कगार पर पहुँच गए हैं. अतः शकरखोरा जैसे महत्वपूर्ण पक्षी प्रजाति के संरक्षण हेतु पर्याप्त कदम उठाये जाने की आवश्यकता है.

References

ALI, SA. 1931. The role of sunbirds and flowerpeckers in the propagation and distribution of the tree parasite Loranthus longiflorus Desr. in the Konkan (W. India). Journal of Bombay Natural History Society. 35: 144-149.

Cheke, RA, Mann CF, Allen R. 2001. Sunbirds: a Guide to the Sunbirds, Flowerpeckers, Spiderhunters, and Sugarbirds of the World. Helm Identification Guide. C. Helm, London.

Evans MR, Hatchwell BJ. 1992. An experimental study of male adornment in the scarlet-tufted malachite sunbird: I. The role of pectoral tufts in territorial defence. Behavioral Ecology and Sociobiology. 29(6):413-9.

Fenster CB, Armbruster WS, Wilson P, Dudash MR, Thomson JD. 2004. Pollination syndromes and floral specialization. Annual Review of Ecology, Evolution, and Systematics. 31:375-403.

Fleming TH, Muchhala N. 2008. Nectar‐feeding bird and bat niches in two worlds: pantropical comparisons of vertebrate pollination systems. Journal of Biogeography. 35(5):764-80.

Inouye DW. 1980. The terminology of floral larceny. Ecology. 61(5):1251-3.

Johnson SD, Steiner KE. 2000. Generalization versus specialization in plant pollination systems. Trends in Ecology & Evolution. 15(4):140-3.

Jyothi PV, Atluri JB, Reddi CS. 1990 Pollination ecology of Moringa oleifera (Moringaceae). Proceedings: Plant Sciences. 100(1):33-42.

Kumar R, Shahabuddin G. 2005. Effects of biomass extraction on vegetation structure, diversity and composition of forests in Sariska Tiger Reserve, India. Environmental Conservation. 32(03):248-59.

Mann CF, Cheke RA. 2010. Sunbirds: a guide to the sunbirds, flowerpeckers, spiderhunters and sugarbirds of the world. Bloomsbury Publishing.

Mehetre SS, Gomes M, Eapen S. 2004. Bird-pollination in Sterculia colorata Roxb.(Sterculiaceae), a rare tree species in the Eastern Ghats of Visakhapatnam and East Godavari Districts of Andhra Pradesh. Current Science. 87(1):28.

Rahman MM, Baksha MW, Sterringa JT. 1993. Ethological observations on the purple sunbird (Nectarinia asiatica Latham): a mistletoe-frequenting bird. Indian Forester. 119(5):388-94.

Raman TS. 2006. Effects of habitat structure and adjacent habitats on birds in tropical rainforest fragments and shaded plantations in the Western Ghats, India. In Forest Diversity and Management pp. 517-547. Springer Netherlands.

Singh VK, Barman C, Tandon R. 2014.  Nectar robbing positively influences the reproductive success of Tecomella undulata (Bignoniaceae). PLoS one. 9(7):e102607.

Solomon Raju AJ. 2005. Passerine bird pollination and seed dispersal in Woodfordia floribunda Salisb.(Lythraceae), a common low altitude woody shrub in the Eastern Ghats forests of India. Ornithological Science. 4(2):103-8.

Stone GN, Raine NE, Prescott M, Willmer PG. 2003. Pollination ecology of acacias (Fabaceae, Mimosoideae). Australian Systematic Botany. 16(1):103-18.

Tandon R, Shivanna KR, Mohan Ram HY. 2003. Reproductive biology of Butea monosperma (Fabaceae). Annals of Botany. 92(5):715-23.

Vineet Singh
Vineet Kumar Singh, Ph.D. Department of Botany, University of Delhi Email: [email protected] Subject Specialization: Plant Reproductive Ecology Area of Interests: Reproductive Biology, Plant-pollinator interaction

2 Comments

  1. Arun

    April 19, 2016 at 3:06 pm

    Nice & informative article Dr Vineet

  2. Dr. Prashant Pant

    Dr. Prashant Pant

    April 20, 2016 at 7:32 pm

    A very refreshing article Dr. Vineet. Keep it up.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *