स्वदेशी विज्ञान.कॉम-एक हिंदी की मासिक विज्ञान ई-जर्नल.

Swadeshi Vigyan,
ISSN 2456-0855

Publishers:

Dr. Arun Kumar Maurya & Dr. Prashant Pant
Address: K-176, Street No.44, Sadatpur Extension, Delhi – 110094 INDIA

विज्ञान मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा है। प्राचीन काल में विज्ञान अमूर्त रूप में मानवीय व्यवहार में शामिल था, लेकिन विकास के साथ विज्ञान मानवीय व्यवहार का अभिन्न अंग बनता गया। विज्ञान ने बदलती परिस्थितियों तथा आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु नाना प्रकार के अविष्कारों तथा खोजों को जन्म दिया। विज्ञान ने मानव-जीवन की गुणवत्ता में सुधार किया और नये आयाम भी स्थापित किए।

वहीँ दूसरी ओर, भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो विज्ञान की निरंतर प्रगति के कारण भारतीय भाषाओँ पर प्रभाव पड़ा। पश्चिमी देशों की उच्च प्रगति ने अंग्रेजी भाषा का प्रभुत्व विज्ञान में स्थापित तथा समाहित कर दिया। इस एकभाषीय प्रभुत्व के कारण भारतीय भाषाओं मुख्यतः हिंदी विज्ञान की मुख्यधारा से धीरे-धीरे कट गयी। इसका मुख्य कारण हिंदी भाषा में जर्नल/विज्ञान पत्रिका की अनुपस्थिति या बहुत कम संख्या में उपलब्ध होना है। यद्यपि हिंदी की शब्दावली सरकार द्वारा उपलब्ध करायी गयी है, लेकिन विश्वविद्यालय तथा महाविद्यालय स्तर पर अध्ययन, अध्यापन तथा अनुसन्धान में उपयोग में न्यूनतम समावेश के कारण विज्ञान में हिंदी हाशिये पर पहुँच गयी।

अनुसन्धान पत्रों/पत्रिकाओं के मुख्यतः अंग्रजी में उपलब्ध होने के कारण हिंदी की व्यापकता सीमित रह गयी। केवल इतना ही नहीं, जहाँ जन-साधारण के साथ विज्ञान को जुड़ना था, वहीँ विज्ञान की पहुँच ही लगभग नगण्य हो गयी और विज्ञान अंग्रेजीभाषी जानकार व्यक्ति-विशेष का होकर रह गया। विदेशी भाषा, जैसे अंग्रेजी यद्यपि एक जोड़ने वाली भाषा के रूप में स्थानीय एवं वैश्विक स्तर पर कार्य करती है लेकिन इस प्रभाव के कारण भारतीय हिंदी-भाषी छात्रों को मातृभाषा छोड़कर दूसरी भाषा में अध्ययन करना पड़ता है। इससे छात्रों का काफी समय इस नवीन भाषा को समझने तथा उसे व्यवहार में लाने में खप जाता है। इसका दुष्प्रभाव मानव व्यवहार पर भी दिखाई देता है, जिसमें छात्रों में रटने की प्रवृति विकसित हो जाती है। वहीं दूसरी ओर, इससे सीखने और मौलिक चिंतन एवं अभिव्यक्ति की प्रवृति तथा क्षमता समाप्त होने लगती है। इन सभी आयामों को ध्यान में रखते हुए हमने एक ऐसी पत्रिका/जर्नल को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है जो उपरोक्त समस्याओं का समाधान कर सके तथा भविष्य में हिंदी आधारित विज्ञान की भारत में प्रगति की नींव रख सके तथा यह विज्ञान की भाषा के रूप में स्थापित हो जाये।

भारत में हिंदी भाषा कई राज्यों में प्रचलित है। इस पत्रिका के माध्यम से हिंदी आधारित विज्ञान में प्राण फूंकी जा सके ऐसी हमारी सोच है और संकल्प भी। इस पत्रिका का प्रयास जीव, जीवन विज्ञान एवं अन्य विज्ञान विषयों के सभी पक्षों को उन्मुक्त रूप से लोगों के सम्मुख लाना है। यह विज्ञान के परंपरागत विषयों से लेकर आधुनिक विषयों तथा तकनीकों को समाहित करने का प्रयास करेगी, जिससे वैज्ञानिक, शिक्षक एवं शोधकर्ताओं के समुदाय विशेषतः जो हिंदी भाषी हैं, उनका व्यक्तिगत, वैचारिक, तथा शैक्षिक विकास होगा और साथ ही साथ वे सदैव अपने आपको विश्वस्तर के ज्ञान-विज्ञान से अद्यतन रख सकेंगे। साथ ही उन्हें अपनी रचनात्मक शक्ति को अभिव्यक्त करने के लिए एक मंच भी प्रदान होगा, ऐसी हमारी अभिलाषा है। आज के समय में जहाँ विज्ञान अंतर्विषयक होता जा रहा है, इस बात को ध्यान में रखते हुए कि यह पत्रिका भी बड़ी सीमा तक विविध विषयों के कलेवर को साथ लेकर चलेगी और इस प्रकार समावेशी होने से पत्रिका का पठन-पाठन करने वाले जन का आधार व्यापक से व्यापकतर होता जायेगा, ऐसी हमारी कोशिश रहेगी।

यद्यपि इस जर्नल के शीर्षक में स्वदेशी शब्द का उपयोग किया गया है जिससे प्रथम दृष्टि में यह प्रतिबिंबित हो सकता है कि यह जर्नल विज्ञान को देशीय या प्रांतीय सीमाओं में बांध रहा है, लेकिन ऐसा कदापि नहीं है क्योंकि इस जर्नल का उद्देश्य भूत, वर्तमान तथा भविष्य में उपलब्ध वैश्विक ज्ञान एवं विज्ञान को देशज भाषा (हिंदी) में प्रस्तुत एवं उपलब्ध करना है।