कीट प्रतिरोधी पराजीनी बी.टी. कपास

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डॉ. प्रीति रावत

सहायक प्रोफेसर, वनस्पति विज्ञान विभाग, दौलत राम कॉलेज

दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

 

Citation: Rawat, P., 2016. कीट प्रतिरोधी ट्रांसजेनिक बीटी कपास. स्वदेशी विज्ञान 1(8), आलेख 1.

Permanent link: www.swadeshivigyan.com/btcottonprawat

 

Abstract

Cotton, Gossypium sp., is an economically important fiber crop that is grown throughout the world. In India, Cotton provides livelihood to millions of people through its cultivation, processing, textile manufacture and trade. Although with increasing area under cotton cultivation, and increasing productivity due to multifactorial management of the fiber crop, insect pest infestation remains the major reason behind poor cotton yield in the country. The genetic modification of plants to express insect-resistance gene offers the potential to overcome the limitations listed above. Bt toxins also known as insecticidal crystal (Cry) proteins from bacterium Bacillus thuringiensis (Bt) are the most extensively used insecticidal molecules used as the basis of defense against insect pests in nearly all genetically modified (GM) crops grown commercially till date. In addition to Bt Cotton, a number of new traits such as drought and salinity tolerance, disease resistance, sucking pest resistance, leaf curl virus resistance and other traits related to cotton fiber quality are also being currently tested for approval for commercial cultivation. These traits hold a great potential for improvement of cotton crop in future.

परिचय (Introduction)

कपास, गोसीपियम प्रजाति (Gossypium spp.), आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण रेशे की फसल (fiber crop) है, जिसको पूरे विश्व में उगाया जाता है| सफेद सोना कही जाने वाली यह फ़सल दुनिया की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है| भारत में इस फ़सल की खेती, प्रौद्योगिकी, वस्त्र निर्माण और व्यापार करने से लाखों लोगों की आजीविका जुड़ी है| पूरे विश्व में भारत ऐसा देश है जहाँ कपास की खेती के अंतर्गत सबसे बड़ा क्षेत्र (11.8 million ha) निर्धारित किया गया है, लेकिन यह उपज के मामले में अब तक काफ़ी पीछे है। भारत में कपास की उपज 513 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, यह आँकड़ा चीन की उपज (1524 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) के आधे से भी कहीं अधिक कम है| हालाँकि, कुल उत्पादन के संबंध में भारत पहले स्थान पर है, जिसकी उपज 26.8 मिलियन 480 पौंड बेल्स है [1]|

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वानस्पतिक विवरण (Botanical Description)

गोसीपियम प्रजाति में 51 भिन्न प्रकार की प्रजातियाँ हैं, जिनमें से 4 प्रजातियाँ, अर्थात, G. hirsutum, G. barbadense, G. arboreum और G. herbaceum, ऐसी हैं जिनको कपड़े के रेशे के स्रोत के रूप में उगाया जाता है [2]| G. arboreum और G. herbaceum की द्विगुणित (2n = 26) (diploid) प्रजातियाँ एशिया और अफ्रीका में ही पाई जाती हैं तथा भारत में ‘देसी कपास’ के नाम से जानी जाती हैं| अन्य दो प्रजातियाँ G. hirsutum और G. barbadense, चतुर्गुणक (tetraploid) (2n = 52) हैं और ‘नई दुनिया का कपास’ (new world cotton) के नाम से जानी जाती हैं [1,2] |

समस्या (Problem)

जैविक और अजैविक प्रतिबल के कारण भारत में कपास की उपज कम होती है| तथापि, भारत में कपास की कम उपज होने का मुख्य कारण कीट प्रकोप (insect-pest infection) है| कपास कई कीटों के प्रति अतिसंवेदनशील है, जिनमें से लगभग 160 कीटों की प्रजातियाँ कपास के जीवन चक्र में विभिन्न चरणों पर फ़सल को नष्ट कर देती हैं, जिसके कारण उत्पादन में भारी नुकसान होता है [3]| इन कीटों में सबसे विनाशकारी बोलवर्म समष्टि (bollworm complex) है, जो अमेरिकन बोलवर्म (Helicoverpa armigera), पिंक बोलवर्म (Pectinophora gossypiella) और सारंग बोलवर्म (Earias vitella) से बना होता है| बोलवर्म समष्टि के अलावा, फ़सल को नष्ट करने वाले अन्य कीट हैं, जैसे जैस्सिड्स (Amarasca bigutulla), वाइट फ्लाई (Bemisia tabaci) और कलंकित पादप बग (Tarnished plant bug) (Lygus sp.)| सामूहिक रूप से यह कीट कपास की फसल को अधिक क्षति पहुंचाते हैं|

भारत में कपास की फ़सल के कीटों को नियंत्रित करने के लिए लगभग 1 करोड़ 60 लाख रुपये के रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है [3]| यह रासायनिक कीटनाशक महंगे और पर्यावरण के लिए हानिकारक होते हैं| ये कीटनाशक गैर-चयनात्मक होते हैं, तथा हानिरहित, लाभकारी और अभिज्ञात कीटों की हत्या कर देते हैं, तदुपरांत पानी और मिट्टी में जमा हो जाते हैं [4]| इन रासायनिक कीटनाशकों का अत्यधिक और अंधाधुंध उपयोग करने से कीटों में कीटनाशकों के विरुद्ध प्रतिरोध पैदा हो जाता है [5]|

जैव-प्रोद्योगिकी एवं हल (Biotechnology and solution)

पौधों का अनुवांशिक संशोधन/परिवर्तन करने से कीट-प्रतिरोध जीन (insect resistance genes) व्यक्त होते हैं जो इन समस्याओं का उन्मूलन करने में सहायता करते हैं| बीटी विषाक्त पदार्थ (Bt toxins), जिनको Bacillus thuringiensis (Bt) जीवाणुओं से प्राप्त किया जाता है| इनसे उत्पादित जैव कीटनाशक के कीटनाशी क्राई क्रिस्टल प्रोटीन्स (CRY) के नाम से भी जाना जाता है| अब तक की व्यावसायिक रूप से उगाई जाने वाली आनुवंशिक रूपांतरित (genetically engineered) फसलों को कीटों से बचाने के लिए इन पदार्थों का सबसे बड़े पैमाने पर आणविक कीटनाशी के रूप में उपयोग किया जाता है| ऐसी फसलों को ‘बीटी फसल’ (Bt crops) कहा जाता है|

क्रिया विधि (Mode of Action)

Bacillus thuringiensis ग्राम-पॉजिटिव जीवाणु (बैक्टीरिया) है, जो बीजाणुओं के विकास के समय प्रोटीन क्रिस्टलीय समावेशन (inclusions) बनाता है [6]| यह क्रिस्टलीय प्रोटीन कम सांद्रता (concentration) पर कीटों की एक विस्तृत विविधता के लिए अत्यधिक विषाक्त क्षमता को  दर्शाते हैं [7]| इन क्रिस्टलीय प्रोटीन्स की उच्च विशिष्टता तथा पर्यावरण की सुरक्षा के लिए, कृषि और वानिकी में कीटों के नियंत्रण के लिए रासायनिक कीटनाशकों के स्थान पर क्रिस्टल (क्राई) प्रोटीन्स मूल्यवान विकल्प हैं [8]| इन क्रिस्टलीय प्रोटीन्स को जब कीटों द्वारा खाया या निगला जाता है, तो वह उनके मध्यांत्र (midgut) में अत्यधिक क्षारीय पीएच (highly alkaline pH) पर घुल जाते हैं, जिससे एक सक्रिय विष का निवारण होता है, जो मध्यांत्र उपकला कोशिकाओं (midgut epithelium cells) से आबद्ध हो जाता है, जिससे परासरण संतुलन बिगड़ जाता है| इस कारण मध्यांत्र  के प्लाज्मा झिल्ली में छेद हो जाते हैं, परिणाम स्वरूप कीट में पक्षाघात हो जाता है तथा अंत में उसकी मृत्यु हो जाती है|

बीटी विषाक्त पदार्थ अपनी गतिविधियों में अत्यंत विशिष्ट होते हैं, गैर लक्ष्य जीवों पर बहुत कम या नगण्य प्रभाव डालते हैं| इसलिए वह अनुवांशिक रूप से रूपांतरित पादप जो बीटी विषाक्त पदार्थों को व्यक्त करते हैं उनका जैव विविधता पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है [9]| ट्रांसजेनिक बीटी फसलें मुख्य कीटों को मारती हैं और कीटनाशक छिडकाव पर निर्भरता को कम करती हैं, जिससे आर्थिक, स्वास्थ्य और पर्यावरण को लाभ होता है [9, 10, 11] |

भविष्य (Future)

बी.टी. फसलों के पहले दशक में बी.टी. आलू (जो cry3A व्यक्त करता है), बी.टी. कपास (जो cry1Ac को व्यक्त करता है) और बी.टी. मक्का (जो cry1Ab को व्यक्त करता है) ही होते थे, जिनको इन फसलों के कुछ मुख्य लेपिडोपटेरन कीटों को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था [12]। बड़े पैमाने पर बी.टी. फसलों की खेती वर्ष 1996 में अमेरिका में आरंभ हुई, जबकी भारत में इसकी व्यवसायिक स्तर पर फ़सल 2002 से शुरू हुई। वर्तमान में भारत के कुल उपज क्षेत्र के लगभग 95% भाग में बी.टी. कपास की खेती की जाती है। आज उपज क्षेत्र के हिसाब से पूरे विश्व के 46% कुल अनुवांशिक रूप से रूपांतरित कपास का उपज क्षेत्र भारत में है। इसका मुख्य कारण है, बाज़ार में बी.टी. कपास की विभिन्न संकर किस्मों की उपलब्धता। सन 2002 में इनकी संख्या 3 थी और 2014 में यह संख्या बढकर 1167 हो गयी है। इस दौरान भारत में कपास उत्पादन तिगुना होकर 13 से 40 मिलियन गाँठ प्रतिवर्ष हो गया है, जिससे वह चीन और अमेरिका से आगे निकलकर विश्व का शीर्ष कपास उत्पादक देश बन गया है [13]। बीटी कपास के अलावा, कपास की दूसरी ट्रांसजेनिक किस्में भी विकसित की जा रही हैं जिनमे सूखा, क्षारीय मिट्टी, रोग, चूसक कीट, और दूसरे विषाणु जनित रोगों के लिए प्रतिरोधक क्षमता तथा कपास के रेशे की गुणवत्ता को और अधिक बढ़ाने के लिए अनुवांशिक तौर पर रूपांतरण एवं परीक्षित किया जा रहा है, ताकि उनकी व्यावसायिक सफलता को आँका जा सके। ये नए पीढ़ी के बदलाव इन फसलों में ना केवल एक नया युग लेकर आयेंगे बल्कि इसके साथ-साथ किसानों की भी सामाजिक-आर्थिक स्थिति में भी प्रगतिशील और आशातीत सफलता लायेंगे।

सन्दर्भ (References):

  1. Cotton: World market and trade 2016, USDA-Foreign Agriculture Service.
  2. Brubaker, C.L., Bourland, F.M., Wendel, J.F., 1999. The origin and domestication of Cotton. In: Smith, C.W., and Cothren, J.T., (Eds.) Cotton: Origin, History, Technology and Production. John Wiley and Sons, New York, pp 3-31.
  3. Manjunath, T.M., 2004. Bt cotton in India: The technology wins as the controversy AgBioWorld http://www.monsanto.co.uk/news/ukshowlib.html?wid=8478.
  4. Christou, P., Capell, T., 2009. Transgenic crops and their applications for sustainable agriculture and food security. In: Ferry NF and Gatehouse AMR (Eds.) Environmental impact of genetically modified crops. CAB International, Wallingford, UK, pp 3-22.
  5. Armes, N.J., Jadhav, D.R., de Souza, K.R., 1996. A survey of insecticide resistance in Helicoverpa armigera in the Indian sub-continent. Bull Entomol Res 86: 499-514.
  6. Hofte, H., Whiteley, H.R., 1989. Insecticidal crystal protein of Bacillus thuringiensis. Microbiol Rev 53: 242-255.
  7. Schnepf, E., Crickmore, N., Van Rie, J., Lereclus, D., Baum, J., Feitelson, J., Zeigler, D.R., Dean, D.H., 1998. Bacillus thuringiensis and its pesticidal crystal proteins 62: 775-806.
  8. Roh, Y.J, Choi, J.Y., Li, M.S., Jin, B.R., Je, Y.H., 2007. Bacillus thuringiensis as a specific, safe and effective tool for insect pest control. J Microbiol Biotechnol 17: 547-559.
  9. Shelton, A.M., Zhao, J.Z., Roush, R.T., 2002. Economic, ecological, food safety, and social consequences of the deployment of Bt transgenic plants. Annu Rev Entomol 47: 845-881.
  10. Carriere, Y., Ellers-Kirk, C., Sisterson, M., Antilla, L., Whitlow, M., Dennehy, T.J., Tabashnik, B.E., 2003. Long-term regional suppression of pink bollworm by Bacillus thuringiensis Proc Natl Acad Sci USA 100: 1519-1523.
  11. Cattaneo, M.G., Yafuso, C., Schmidt, C., Huang, C., Rahman, M., Olson, C., Ellers-Kirk, C., Orr, B.J., Marsh, S.E., Antilla, L., Dutilleul, P., Carriere, Y., 2006. Farm-scale evaluation of transgenic cotton impacts on biodiversity, pesticide use and yield. Proc Natl Acad Sci USA103: 7571-7576.
  12. de Maagd, R.A., Bosch, D., Stiekema, W., 1999. Bacillus thuringiensis toxin-mediated insect resistance in plants. Trends Plant Sci 4: 9-13.
  13. ISAAA, 2015. Biotech Country facts and trends-India, International service for the acquisition of Agri-Biotech Application. (www.isaaa.org)
Dr. Preeti Rawat

1 Comment

  1. arun

    October 28, 2016 at 7:24 am

    Good one and informative article

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