उत्तर-पश्चिम उप-हिमालय की साइनोबैक्टीरियल विविधता

छायाचित्र 3: हेटरोसिस्ट- साइनोबैक्टीरिया के नोस्टोकेलीस संघ में नाइट्रोजन स्थिरीकरण हेतु पाए जाने वाली विशिष्ट संरचनाएं (अन्य कोशिकाओं से आकार में काफी बड़ी)

डॉ मुकेश कुमार

वनस्पतिविज्ञान विभाग, साहू जैन पी.जी. कॉलेज, नजीबाबाद, उत्तर प्रदेश
Citation: कुमार, मुकेश., 2016. उत्तर-पश्चिम उप-हिमालय की साइनोबैक्टीरियल विविधता. स्वदेशी विज्ञान 1(3). आलेख 3 (ISSN 02456-0855 online)
Available at: http://swadeshivigyan.com/cyanobacteria
अनुवाद एवं संपादन: डॉ. अरुण कुमार मौर्य एवं प्रोफेसर गणेश शंकर पालीवाल

 

साइनोबैक्टीरिया  सूक्ष्मजीवाणुओं  का एक अद्वीतीय समूह है। इनके द्वारा आवश्यक फायकोबिलिन (Phycobillin) तथा  क्लोरोफिल ‘ए’ (Chlorophyll ‘a’) जैसे रंजकों (पिगमेंट्स) का संश्लेषण किया जाता है, जिनसे इनमें पिगमेंट अनुपात के सामंजस्य के साथ-साथ विभिन्न परिवहन तंत्रो के साथ जोड़ कर प्रकाशसंश्लेष्णीय अवसरंचना की क्षमता में माडुलेशन किया जाता है।

वैश्विक स्तर पर साइनोबैक्टीरिया की प्रमुखता/वितरण की ओर देखें तो पता चलता है, कि इनके 150 वंशों (genera) के अंतर्गत 2500 प्रजातियाँ (species) वितरित हैं। इस अनुसंधान कार्य में एपिलिथिक (eplilithic), एपिफिलिक (epiphillic), स्थलीय (terrestrial), एपिफिटिक (epiphytic), एपीपेलिक (epilpelic), प्लैंकटोनिक (planktonic) तथा मिश्रित प्रजातियाँ सम्मिलित हैं। इनका अध्ययन विभिन्न मौसमों में तथा विविध आवासों में किया गया है (छायाचित्र 1अ-ई तक).

छायाचित्र 1: प्रकृति के विभिन्न आवासों में पाई जाने वाली साइनोबैक्टीरिया. (अ):धान के खेत में स्थित स्थलीय साइनोबैक्टीरिया (नील हरित शैवाल)

छायाचित्र 1: प्रकृति के विभिन्न आवासों में पाई जाने वाली साइनोबैक्टीरिया. (अ):धान के खेत में स्थित स्थलीय साइनोबैक्टीरिया (नील हरित शैवाल)

छायाचित्र 1(आ):वृक्ष के तने पर उगी एपिफ़िटिक साइनोबैक्टीरिया

छायाचित्र 1(आ): वृक्ष के तने पर उगी एपिफ़िटिक साइनोबैक्टीरिया

छायाचित्र 1(इ):पर्वत की चट्टान पर स्थित एपिलिथिक साइनोबैक्टीरिया

छायाचित्र 1(इ):पर्वत की चट्टान पर स्थित एपिलिथिक साइनोबैक्टीरिया

छायाचित्र 1(ई):जल की सतह पर तैरती जलीय साइनोबैक्टीरिया

छायाचित्र 1(ई):जल की सतह पर तैरती जलीय साइनोबैक्टीरिया

 

छायाचित्र 2: साइनोबैक्टीरिया की एक तंतुलयुक्त प्रजाति.

छायाचित्र 2: साइनोबैक्टीरिया की एक तंतुलयुक्त प्रजाति.

साइनोबैक्टीरिया, विशेषतः तंतुलयुक्त प्रजातियाँ (Filamentous species) हैं, जिनमें हेटेरोसिस्ट (Heterocyst) नाम की विशेष लाक्षणिक कोशिका पायी जाती है (छायाचित्र 2 व 3), जिसकी सहायता से नाइट्रोजन स्थिरीकरण का कार्य दक्षता से संपन्न होता है। हेटेरोसिस्ट सामान्यतः एक मोटी भित्ति से घिरे रहते हैं, जिसके कारण उनमे आक्सीजन प्रवेश नहीं कर पाती. यह दशा हेटेरोसिस्ट में अवायवीय (आक्सीजन-विहीन) श्वसन का निर्माण करती है और केवल इसी दशा में ही नाइट्रोजन स्थिरीकरण संभव हो पाता है।

छायाचित्र 3: हेटरोसिस्ट- साइनोबैक्टीरिया के नोस्टोकेलीस संघ में नाइट्रोजन स्थिरीकरण हेतु पाए जाने वाली विशिष्ट संरचनाएं (अन्य कोशिकाओं से आकार में काफी बड़ी)

छायाचित्र 3: हेटरोसिस्ट- साइनोबैक्टीरिया के नोस्टोकेलीस संघ में नाइट्रोजन स्थिरीकरण हेतु पाए जाने वाली विशिष्ट संरचनाएं (अन्य कोशिकाओं से आकार में काफी बड़ी)

यह अनुसंधान/शोध कार्य पहली बार तीन राज्यों (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश तथा जम्मू-कश्मीर) के 19 विभिन्न स्थलों, तुंगताओं, स्थलाकृतियों, मृदा के पीएच, मौसम से लगभग 329 प्रजातियों (species) जोकि 5 गणों (orders), 14 कुलों (famillies) और 56 वंशों (genera) के अंतर्गत आतें है, की रिपोर्ट उपलब्ध कराता है।

इस अध्ययन से निम्न तथ्य पता चले है कि:

  1. नोस्टोकेलीस (Nostocales) गण-समूह की इन क्षेत्रों में प्रधानता (66%) है तथा क्लोरोकोक्केलीस (Chlorococcales) (29%), कीमोसाइफोनेलीस (Chemosiphonales) एवंप्लूरोकेपसेलीस (Pleurocapsales) (दोनों लगभग 2%) तथास्टीगोनिमैटेलीस (Stegonematales) की उपस्थिति 1% है।
  2. अधिकाँश स्थलों की मृदा संरचना (soil texture), पिण्डयुक्त, चिकनी मिटटी, सिल्ट, तथा बलुई है। मृदा जल के पीएच (pH) का परास 6.5 से 8.2 तक पाया गया है. विभिन्न स्थलों की तुंगता तथा पारिस्थितिकी लक्षणों में विभिन्नता होने के कारण साइनोबैक्टीरियल प्रजातियों के संगठन तथा घनत्व में विविधता उत्पन्न होती है।
  3. मृदा जल के क्षारीय प्रकृति से उदासीन बिंदु की ओर बढने पर साइनोबैक्टीरिया की प्रजातियों की संख्या बढती जाती है।
  4. अधिकाँश वर्गों के अनुसार देखें तो इस अनुसंधान से यह पता चलता है कि संपूर्ण पर्वतीय क्षेत्र में लिथोफिलिक वर्गक, अन्य वर्गकों की तुलना में अधिक पाए जाते हैं। इसके बाद स्थलीय प्रजातियों की संख्या आती है। एपिफायटिक तथा एपिफिलिक अधिवास क्रमशः तीसरे तथा चौथे स्थान पर आते हैं। प्लैंकटॉनिक तथा मिश्रित अधिवास समूह बचे हुए वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  5. इस तरह विभिन्न प्रजातियाँ अपने अधिवास तथा पारिस्थितिकीय क्षेत्र-विशेष (niche) की वरीयता दर्शाती हैं।
  6. इस अनुसंधान से यह पता चला कि नास्टोकेलीस (Nostocales) के सदस्य सर्वप्रभावी उपस्थिति को दर्शातें है, इसके बाद क्लोरोकोक्केलीस (Chlorococcales), स्टीगोनिमेटेलीस (Stegonematales), कीमोसाईफोनालीस (Chemosiphonomales) आते है। प्लूरोकेपसेलीस (Pleurocapsales) की उपस्थिति अपेक्षाकृत दुर्लभ है।
  7. नाइट्रोजन-विहीन स्थलों/क्षेत्रों में साइनोबैक्टीरिया की उपस्थिति प्रमुख रूप में पायी गयी है।
  8. वर्तमान अध्ययन में पाया गया, कि साइनोबैक्टीरियाकी उपस्थिति अप्रत्यक्षरूप से मृदा जल के विद्युत् संचालकता (Electrical Conductivity) पर निर्भर करती है।
  9. प्रामाणिक रूप से यह पाया गया है कि एक स्थल पर अनेक कारकों के समेकित प्रभाव साईनोबैक्टीरिया के स्वरुप तथा वितरण को प्रभावित करते हैं तथा यह निश्चित करना बहुत ही कठिन है कि कोईएक कारक का योगदान अन्य कारकों से अधिक प्रभावी है।
  10. कीमोसाइफोनेलीस (Chemosiphonales) तथा स्टीगोनिमेटेलीस (Stegonematales) समूह के सदस्य साइनोबैक्टीरियल संख्या में तुलनात्मक रूप से सीमित वितरण दर्शाते हैं जबकि हल्द्वानी, रामनगर, रुद्रपुर, काशीपुर, खोदरी-माजरी, पांवटा साहिब, ऊना, जम्मू एवं मानेसर से प्लूरोकेपसेलीस (Pleurocapsales) के एक भी सदस्य की उपस्थिति नहीं अंकित की गई।
  11. कुमाऊँ क्षेत्र में विद्यमान स्थानों का विशेष महत्व इस कारण है, कि यहाँ के किसी भी स्थल से प्लूरोकारपेलीस (Pleurocapales) के सदस्य नहीं पाए गए हैं।
  12. साइनोबैक्टीरिया की जनसंख्या गत्यात्मकता (Population dynamics) पर प्रकाश तथा तापमान जैसे कारकों का विशिष्ट प्रभाव पडता है। तेज़ चमकीला प्रकाश क्लोरोकोक्केलीस (Chlorococcales) गण (order) के सदस्यों की वृद्धि में सहयोग करता है जबकि हल्का प्रकाश नोस्टॉकेलीस (Nostocales) के सदस्यों के उपस्थिति में वृद्धि करता है। औसत तापमान (20-38C) साइनोबैक्टेरिया वर्गक (taxa) की वृद्धि तथा जनन हेतु उचित पाया गया है।
  13. विश्व में साइनोबैक्टीरिया के वितरण, गुणन तथा उद्धविकास में उनके अधिवासों के विनाश, अतिक्रमण तथा विखंडन प्रमुख कारण के रूप में क्षति उत्पन्न कर रहे हैं। हमारे देश में, जिसमें वर्तमान अध्ययन भी सम्मिलित है, भी इन्हीं समस्याओं से जूझ रहा है। जितनी जल्दी हम इन क्षेत्रों तथा अधिवास के आंकडो को जुटा लेंगे उतनी ही सफलतापूर्वक इनके भविष्य के बारे में समझ पायेंगे तथा उनके अधिवास एवं प्रजातियाँ का संरक्षण कर सकेंगे।
Dr. Mukesh Kumar
डॉ. मुकेश कुमार, वनस्पतिविज्ञान विभाग, साहू जैन पी.जी. कॉलेज, नजीबाबाद, उत्तर प्रदेश

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *