स्वदेशी विज्ञान – प्रथम वर्षगाँठ के सुअवसर पर

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प्रिय  पाठक,

आपके साथ हमें यह साझा करते हुए हर्ष हो रहा है कि स्वदेशी विज्ञान जर्नल ने सफलतापूर्वक एक वर्ष पूर्ण कर लिया है। यह कहना इसलिए  समीचीन प्रतीत हो रहा है कि भारत जैसे विशाल हिन्दी भाषी राष्ट्र मे जहां अनेक अंग्रेजीभाषी जर्नल उपलब्ध है वहीं हिन्दीभाषा में  इनकी संख्या लगभग नगण्य  है। इस दृष्टिकोण से यह पता चलता है भारतीय जनमानस में  वैज्ञनिक लेखन की हिंदी भाषा में अत्यंत कमी है। इसका एक कारण वैश्विक स्तर पर अंग्रेजीभाषा की स्वीकार्यता तथा सुलभ उपलब्धता होना है। इसी कारण स्वदेशी विज्ञान में आलेखो की प्राप्ति में भी बहुत उतार चढ़ाव देखने को मिला, लेकिन इन सब के बावजूद इसकी गत्यात्मकता बनी रही इसके लिए जर्नल अपने सभी पाठकों, योगदानकर्ताओ तथा अपने संपादको,तथा प्रबंधको का आभारी है।आशा करते हैं कि ऐसा सहयोग आगे भी बना रहेगा और जर्नल अपनी नई उँचाइयोँ को प्राप्त करेगा।

हमें यह भी साझा करते हुए हर्ष की अनुभूति हो रही है कि जर्नल को विदेशों में कार्यान्वित प्रवासी भारतीय वैज्ञानिकों से भी बधाई संदेश मिले हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने हमसे जुड़कर विज्ञान की उन्नति एवं हिन्दीभाषी विज्ञान में रुचि रखने वाले सभी पाठकगणों के लिए आलेखों  के माध्यम से योगदान का आश्वासन भी दिया है। इन व्यक्ति विशेषों  में डॉ. सुभाष मनोचा (अमेरिका) एवं डॉ. मनुस्मृति सिंह (इजराइल) का नाम उल्लेखनीय है।

इस माह के अंक में जहाँ हम एक ओर  समाज मे तेजी से विस्तारित हो रही गैरसंचारी रोग कैंसर तथा उससे जुडे नवीन आयामों तथा आकडों पर चर्चा करेगें, वहीं दूसरी ओर उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में अवस्थित एक वैज्ञनिक संस्थान गोविन्द वल्लभ पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान तथा उसके द्वारा पर्यावरण के क्षेत्र मे किए गए  कार्यो की चर्चा की गई है।
आशा है कि पाठक इन दोनो लेखों से लाभान्वित होगें।

डॉ. अरुण  कुमार मौर्य एवं डॉ. प्रशांत पंत

संपादक

Dr. Arun Kumar Maurya
डॉ. अरुण कुमार मौर्य, एक शिक्षक, शोधकर्ता और लेखक के रूप में दयाल सिंह कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं. डॉ. मौर्य ने पादप कार्यिकी एवं जैव-रसायन में विशेषज्ञता के साथ वनस्पति विज्ञान में एम.फिल और पीएचडी प्राप्त किया है. वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय में विधि स्नातकोत्तर में अध्ययनरत हैं. उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय से बौद्धिक संपदा अधिकार कानून (PGDIPRL) (एनएलएसआइयू), बंगलौर से एक डिप्लोमा भी अर्जित किया है. वे एक उत्साही वन्य जीव फोटोग्राफर भी हैं तथा उन्होंने इस सम्न्बंध में कई लेख लिखे हैं.

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