जलवायु परिवर्तन की विभीषिका रोकने के क्रम में अनूठा प्रयास

 प्रोफेसर गणेश शंकर पालीवाल
  मुख्य संरक्षक, स्वदेशी विज्ञान

जैसा कि हम में से कुछ जानते हैं कि अमेरिका के मध्यवर्ती क्षेत्र में बसे कैलिफ़ोर्निया प्रान्त में विश्व के सबसे पुराने, सबसे ऊंचे और सबसे स्थूलकाय वृक्ष हैं जिन्हें Sequoia, Sequoidendron के नाम से भी जाना जाता है. इनमे से कई वृक्ष तो पांच हज़ार वर्ष तक पुराने हैं. जबकि अनेक 3 से 4 हज़ार वर्ष की आयु है. कुछ तो इतने विशालका्य है कि इनके तनों को काट कर और इनमे छेद बनाकर सड़कें बना दी गयी है, जिन पर कारें सरपट दौड़ती है.

हाल ही के दिनों में दो वृक्ष-वैज्ञानिकों ने एक अद्भुत प्रयास किया और एक कुतुबमीनार से भी ऊँचे वृक्षों पर रस्सियाँ बांध कर चढे, जहां से वे इन वृक्षों की नवीनतम हरी टहनियां एकत्रित करना चाहते थे, जिनके पुनर्जन्म (Regeneration) और कार्यिकी (Physiology) के शोध के आधार पर उस विलक्षण शारीरिक क्रिया का पता चल सके, जिसके कारण इन वृक्ष प्रजातियों में विविध प्रकार के रोगों तथा प्रतिबलों को हज़ारों वर्ष तक सहने की अभूतपूर्व क्षमता बनी रही.

इन वृक्ष-विज्ञानियों ने ऊपर से अत्यंत सावधानी लायी हुई टहनियों के शीर्षों को काटा और हाथों-हाथ पूरे देश के विश्वविद्यालयों की उन प्रयोगशालाओं में पहुँचाया, जहां ऊतक संवर्धन (Tissue Culture) विधि से इनके अनेकानेक नवोदविद (seedlings) उत्पन्न किये गए जिन्हें समय समय पर कैलिफ़ोर्निया और विश्व के कई अन्य क्षेत्रों के वनों में रोपा गया जिससे कि वे अपने पूर्ववर्ती जनक पादपों की भांति एक बार पुनः विशालकाय वृक्ष बन जाए. उनका मानना है कि इन वृक्षों में आनुवंशिकीय गुणों का ऐसा समावेश है जो हमें यह समझने में सहायता प्रदान करेगा कि अंततः इन में और ऐसी ही समकक्ष प्रजातियों में वे कौन कौन से लक्षण हैं जो हमें जलवायु परिवर्तन की घटना को बड़ी सीमा तक समझने और फिर उसे परिवर्तित करने में सहायता करेंगे.

यह वास्तव में एक जैव-वैज्ञानिक अचरज है कि इस छोटे से टुकड़े में रसायनों की सहायता से जडें उत्पन्न की जा सकती है और तीन हज़ार वर्ष पुराने पादपों के बौने रूप तैयार किये जा सकते हैं. पिछले दो दशकों में मिशिगन राज्य में स्थित पौधशालाओं के सहकर्मियों ने 170 प्रजातियों के क्लोन पादप तैयार किये हैं और विश्व के 7 देशों में तीन लाख से भी अधिक पौधों का रोपण किया है. वैज्ञानिक मिलार्च (Milarch) का कहना है कि वास्तव में “हम समय के विरुद्ध दौड़ लगा रहे हैं और यदि यह कार्य हम आज प्रारंभ करें तो बहुत देर हो चुकने से पूर्व कुछ न कुछ सीमा तक तो जलवायु परिवर्तन की गति को कम कर ही सकेंगे. मिलार्च का मानना है कि वास्तव में हरित-ग्रह गैसों के प्रभाव जिसके कारण पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन हो रहा है का अध्ययन करने की दृष्टि से ऐसे वृक्ष आदर्श हैं, क्योंकि इन्होंने बहुत लम्बी अवधि तक इसे झेला है. उनके अनुसार यह वृक्ष  उन मनुष्यों की तरह है, जो लम्बी अवधि तक प्रदूषित वातावरण में तथा हानिकारक पदार्थ जैसे तम्बाकू, शराब इत्यादि का सेवन करते है और फिर भी किन्ही कारणों से 90 वर्ष तक जीवित भी रहते हैं.

तथ्य यह है कि इन प्राचीन प्रजातियों के वृक्षों का क्लोन बनाना सरल नहीं है, क्योंकि इनसे प्राप्त कई नवोदविद (seedling) तो युवावस्था प्राप्त होने से पहले ही मृत हो जाते हैं और वैज्ञानिकों की आशाएं धूमिल हो जाती है. अतः नए सिरे से प्रयास करना होता है और नए नए क्षेत्रों में अलग-अलग प्रजातियों का रोपण कर उनकी वृद्धि  पर जलवायु परिवर्तन के असर का अध्ययन करना होता है.

कुछ लोगों के अनुसार इतने बड़े स्तर पर हो रहे वैश्विक तापन (ग्लोबल वार्मिंग) के क्रम में यह एक बहुत छोटी सम्भावना है क्योंकि इसके परिणाम निकट भविष्य में सम्मुख नहीं आयेंगे, लेकिन बिल वर्मन नाम के उद्यानिकी परामर्शदाता के अनुसार “ऐसा सोचना बे-मानी है क्योंकि यद्यपि यह प्रयास एक सागर में एक बूँद के समान है लेकिन वास्तविकता  यह है कि कहीं तो कुछ हो रहा है, और कोई तो कुछ कर रहा है इससे अंततः कुछ परिणाम तो आयेंगे ही”.

Dr. Prashant Pant

डॉ. प्रशांत पंत एक शिक्षक, शोधकर्ता, एवं लेखन के रूप में दयाल सिंह महाविद्यालय में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं. उन्होंने आणविक परिस्थितिकी एवं परिस्थितिकी तंत्र में पुनर्स्थापन में पीएचडी प्राप्त किया है. उन्हें दिल्ली हिंदी साहित्य अकादमी, दिल्ली सरकार की ओर से हिंदी छात्र प्रतिभा पुरुस्कार से सम्मानित किया गया है.उनके अन्य रूचिकर विषय वानिकी, लेग्युम फाइलोजेनी, एवं जैव-सूचना विज्ञान हैं. वर्तमान में वे दिल्ली यूनिवर्सिटी के अंतर्गत एक डिग्री कॉलेज में सहायक प्रोफ़ेसर के पद पर नियुक्त हैं. इसके अलावा वे कई अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रों तथा ऑनलाइन जर्नल “बायोइन्फरमेटिक्स रिव्यु” के मुख्य कार्यकारी संपादक के रूप में कार्यरत हैं.

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