विज्ञान और समाज

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 प्रोफेसर एम. एस. स्वामीनाथन

एम. एस. स्वामीनाथन शोध संस्थान, चेन्नई

Citation: स्वामीनाथन, एम. एस., 2016. विज्ञान और समाज. स्वदेशीविज्ञान 1(8), आलेख 2 .
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(हिंदी रूपांतरण: प्रोफेसर गणेश शंकर पालीवाल, मुख्य संरक्षक, स्वदेशी विज्ञान)

 

वैश्विक महत्व के कृषि परंपरा स्थलों का संरक्षण 

Conserving Globally Important Agricultural Heritage Sites (GIAHS)

एम. एस. स्वामीनाथन शोध संस्थान द्वारा प्रस्तुत किये गए एक प्रस्ताव के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय खाद्य एवं कृषि  संस्थान  (FAO) ने केरल के कुट्टानाड क्षेत्र को अंतर्राष्ट्रीय  महत्व का ‘कृषि परंपरा स्थल’ (Agricultural Heritage Sites) घोषित किया है, जिसके संरक्षण की महती आवश्यकता है. ज्ञातव्य है कि कुट्टानाड एक “रामसर अंचल” भी है जो अब महत्वपूर्ण जल-पर्यटन स्थली के रूप में विकसित हो गया है. दुर्भाग्यवश मानव के विभिन्न क्रिया-कलापों के कारण यहाँ का परितंत्र पर्याप्त रूप से बिगड़ चुका है और यह परितंत्र क्षेत्र अब कृषि की दृष्टि से अत्यंत अपघटित जनपदों में से एक बन गया है. इस स्थिति से निपटने के लिए संस्थान ने पांच वर्ष पूर्व एक ऐसी योजना तैयार की कि कुट्टानाड का पारितंत्र पुनः स्थापित किया जा सके. इस दृष्टि से इस क्षेत्र के कृषकों द्वारा 150 वर्ष पूर्व अपनाई गयी कृषि की उन तकनीकों को प्रयोग में लाया गया, जिनके माध्यम से समुद्र के नीचे के स्तरों पर खेती संभव हो सकी है. वस्तुतः आज भी हम इस  विधि से बहुत कुछ सीख सकते हैं, क्योंकि इसमें पादपों की रोपाई बाँध बनाकर समुद्र से भूमि आग्रहीत कर (reclaim) की जाती है. यह हॉलैंड  के कृषकों  द्वारा अपनाई गयी तकनीक से भिन्न है, जहां इस प्रक्रिया के लिए सीमेंट के   बाँध बनाये जाते हैं. वर्तमान योजना जिसे राज्य एवं केंद्र  दोनों ही सरकारों की स्वीकृति  मिल चुकी है, में 150 वर्ष पुरानी विधि को अपनाया गया है जिसके द्वारा बाढ़ नियंत्रण और लवणता प्रबंधन दोनों में सफलता मिल सकेगी . यह भी सुझाया गया है कि कुट्टानाड की इस अनोखी विधि को और आगे बढाया जाए ताकि इसका अन्य देशों में जहां समुद्र स्तर से नीचे कृषि करनी होती है, प्रचार प्रसार हो सके.

केरल सरकार  इस योजना के अलग अलग अवयवों को लागू करने का प्रयास कर रही है लेकिन कुछ मूल-भूत बिन्दुओं पर अभी भी काम होना शेष है, फिर भी एक बात स्पष्ट है कि समुद्र के जल स्तर में बढ़ोतरी, वैश्विक तापन (Global Warming) के कारण ही होती है और यही स्थिति भारत के एक अन्य क्षेत्र “सुन्दर बन” के साथ-साथ मालदीव जैसे देशों में भी देखी जा सकती है. किसानों के पुराने अनुभवों के आधार पर धान, मछली और नारियल जैसे कृषि-तंत्रों को यहाँ सफलतापूर्वक बढ़ावा दिया जा सकता है.

आंकड़ों के आधार पर यह तथ्य सामने आया है, कि आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण की समस्या बहुत विकराल है. यह एक दुखद स्थिति है क्योंकि इन क्षेत्रों में कृषि जैव विविधता बहुत विपुल होती है. एक उदाहरण अटापड्डी क्षेत्र का है जहां के आदिवासी विविध प्रकार की पोषण सम्बन्धी कमियों के कारण बुरी तरह प्रभावित होते रहे हैं. नवीन ज्ञान के अनुसार अब ऐसा अवसर आ गया है कि इस कुपोषण ग्रस्त ‘तप्त –स्थल’ (hot spot) को ‘पोषण बहुल आन्दोलन’ (nutri-farm movement)  का नेतृत्व मिल जाए.

केरल सरकार ने  अटापड्डी के 1000 भूमिहीन आदिवासी परिवारों को 1800 एकड़ उपजाऊ भूमि आवंटित करने का निर्णय लिया है. इस प्रकार इन परिवारों को तीन लाभ हुए. इन्हें भोजन तो मिला ही, काम भी मिला और इनकी आय भी बढ़ी. हमारे सामने चुनौती यह है कि इन परिवारों को इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाये कि यह उन फसलों की खेती करें, जो पोषण की विकृतियों का निवारण कर सकें. मेरा सुझाव है कि क्षेत्र विशेष की भोजन सम्बन्धी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए फसलों का चयन किया जाए. उदाहरण के लिए –सहजन, कटहल, शकरकंद, आंवला, प्रोटीन-बहुल ऐसी फसलें हैं जिनको उगाकर कुपोषण से ग्रस्त परिवारों के पोषण स्तर को बड़ी सीमा तक उन्नत बनाया जा सकता है, इसीलिए मेरा यह भी सुझाव है कि जब भी आदिवासी परिवारों को जमीन आवंटित की जाए तो उसमे से कुछ भाग में पोषण-बहुल फसलों की खेती पर अवश्य ध्यान दिया जाए, जिससे उनकी भूख और भोजन में प्रोटीन की कमी की समस्या का निदान हो सके. इस प्रकार अटापड्डी क्षेत्र पोषक कृषि आन्दोलन का ध्वजा-वाहक क्षेत्र बन सकता है और इसकी वर्तमान छवि जो कुपोषण के तप्त-स्थल की है, अंततः मिट जाएगी. मेरी आशा है कि इस अवसर को हाथ से नहीं जाने दिया जायेगा.

मृदा का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष

International Year of the Soil

वर्ष 2015 को संयुक्त राष्ट्र संस्था द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मृदा वर्ष घोषित किया गया है. ज्ञातव्य है कि जल कृषि (Aquaculture) के क्षेत्र में हमने चाहे कितनी भी प्रगति क्यों न की हो, मानव मात्र की भूख मिटाने के लिए प्राप्त होने वाले समस्त विश्व के भोजन का 90% अब भी धरती माता से ही प्राप्त होता है. हमारे प्रधानमन्त्री पहले ही यह घोषणा कर चुके हैं कि सभी किसानों को मृदा-स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card) आवंटित किये जायेंगे. यह एक सुखद पहल है, लेकिन साथ ही हमें मृदा के सर्वेक्षण और सुधार के केन्द्रों की भी स्थापना करनी होगी. यह केंद्र कृषकों के परिवारों को विविध रूपों में सहायक सिद्ध होंगे, क्योंकि यह मृदा की भौतिक, रासायनिक, जैविक तथा सूक्ष्मजैविकी गुणों से सम्बंधित जानकारी तो प्रदान करेंगे ही साथ ही आवश्यकता पड़ने पर उनके बारे में उचित सुझाव भी दे सकेंगे. इस क्रम में मृदा के स्वास्थ्य के सर्वेक्षण का एक सरल तरीका यह है कि इसमें केचुए उपास्थित है या नहीं. इस सरल विधि को और भी लोकप्रिय बनाये जाने की आवश्यकता है. जैसा कि हम सब जानते है कि मृदा और जल का सम्बन्ध बहुत निकट का है, फिर भी हमें यह ध्यान रखना होगा कि सिंचाई की विधियों का उपयोग इस प्रकार किया जाय कि मृदा में लवणता न बढे और न ही उसका अपरदन हो. वास्तव में अन्तर्राष्ट्रीय मृदा वर्ष, मृदा के संरक्षण और उसके स्वास्थ्य के सन्दर्भ में पूरी तरह ध्यान रखने की दिशा में एक समग्र प्रयास का प्रारंभ हो सकता है. साथ ही हमें उत्तम गुणवत्ता वाली  और भरपूर उत्पादन प्रदान करने वाली मृदाओं के क्षेत्रों को ‘विशेष कृषि अंचलों’ (Special Agricultural Zones) में चिन्हित करना होगा. इस हेतु उपयुक्त चयन बिंदु आधार रूप में रखने होंगे. इस दृष्टि से यह अत्यंत आवश्यक है कि इस वर्ष पूरे देश की मृदा सम्पदा के सन्दर्भ में उसके संरक्षण और उन्नत बनाने कि लिए भरपूर प्रयास किये जाने चाहिए. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अगले 20 वर्षों में देश की यही मृदा 150 करोड़ तक पहुंची हमारी जनसँख्या का भरण पोषण करेगी.

एल नीनो प्रभाव का प्रबंधन

Managing the El Nino impact

मौसम विभाग के अनुसार ‘एल नीनो’ (El Nino) की परिघटना भू मध्य रेखीय एवं पूर्वी प्रशांत महासागर क्षेत्र के असामान्य तापन के फलस्वरूप पैदा होती है, जिससे एशिया का विशेष क्षेत्र बादलों के निर्माण और वर्षा से वंचित हो जाता है. इस प्रकार यह स्पष्ट है कि इन स्थितियों का हमारे देश की कृषि और कृषकों पर दूरगामी प्रभाव होगा क्योंकि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाएगी कि कुछ स्थानों पर तो पानी अधिक बरसेगा और कहीं पानी की कमी होगी.  यद्यपि भारत सरकार ने यह घोषणा की है कि उसने इस प्रकार के मानसून के अनुपयुक्त और भविष्यवाणी से परे मानसून के व्यवहार से निपटने के लिए कुछ आपातकालीन योजनायें तैयार की है, जिससे इस प्रकार की स्थिति का प्रभाव कम से कम हो. इस क्रम में यह आवश्यक है कि हम कृषक परिवर्रों को इन आपातकालीन योजनाओं के सन्दर्भ में विस्तृत ज्ञान प्रदान करें और उन्हें यह भी बताएं कि इन योजनाओं को किस प्रकार प्रयोग में लाया जा सकेगा. इस ओर स्वामीनाथन संस्था द्वारा ओडीशा राज्य के कोरापुट जिले में  समुदाय द्वारा संगठित और व्यवस्थित जीन, दाने, बीज, एवं जल-कुंडों को बढावा देना एक प्रयास है. इस प्रकार बीज बैंक और जल-कुंड जलवायु की दृष्टि से बहुत ध्यान रखे जाने वाली फसलों के रोपण और वृद्धि की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं. अतः यह उचित होगा कि हम पहले चरण के रूप में समुदाय ‘एल नीनो’ प्रबंधकों का एक दल तैयार करें जिसे जलवायु प्रबंधन के सम्बन्ध में संपूर्ण ज्ञान हो. हमें यह नहीं भूलना चाहिए  कि  यद्यपि जलवायु की विपरीत परिस्थितियों के प्रभाव का पूरी तरह समापन नहीं किया जा सकता, लेकिन फिर भी उचित ज्ञान प्राप्त कृषक, वैज्ञानिक , नीति-निर्माता और अन्य सहयोगी वर्षा की कमी अथवा आधिक्य का निपटारा बड़ी सीमा तक कर सकते हैं. इस प्रकार की सेवाओं में दक्ष-दल के सदस्यों की हमारे देश के सभी 130 कृषि-पारिस्थितिक अंचलों में आवश्यकता होगी.

आनुवांशिक रूपांतरित फसलों का आगमन

Advent of the era of Genetically Modified Crops

समाचार पत्रों में प्रकाशित ख़बरों से ये स्पष्ट है कि हमारे प्रधानमन्त्री जी ने यह मन बना लिया है कि देश में कृषि की उत्पादकता और कृषकों को लाभ की दृष्टि से आनुवांशिक रूप से रूपांतरित फसलों की खेती की जाए. जैसा की हम जानते है आनुवांशिक रूपांतरण का इतिहास 1953 से प्रारंभ हुआ था जब तीन वैज्ञानिकों वाटसन, क्रिक, एवं विल्किंस ने डी.एन.ए अणु की द्विकुंडलित संरचना की घोषणा की थी. शनै: शनै: 1980 के आते-आते उचित संवाहकों का उपयोग कर एक जीव से दूसरे जीव में जीन के स्थानांतरण की विधि पूरी तरह व्यवहार में  आ गयी और सबसे पहले पेटूनिया नामक आलंकारी, एकवर्षी पादप में आनुवांशिक रूपांतरण में सफलता मिली और एक नए प्रकार के पुष्प का प्रादुर्भाव हुआ. तब से आज तक आनुवांशिकी रूपांतरित जीवों का व्यावसायिक कृषि और नए नए प्रयोगों के लिए एक लम्बी परास तैयार हो चुकी है. लेकिन मानव और पशुओं के स्वास्थ्य पर और साथ ही पर्यावरण एवं जैव-विविधता के सन्दर्भ में कुप्रभाव के संशय ने यह अत्यंत वांछनीय कर दिया है कि इस सन्दर्भ में जैव-सुरक्षा पर नियंत्रण अपनाये जायें. जैसा कि अपेक्षित है संयुक्त राज्य अमेरिका  में सबसे अधिक आनुवांशिक रूपांतरित पौधों की व्यवसायिक खेती की जाती है  लेकिन भारत में अभी तक मात्र कपास की एक आनुवांशिक रूपांतरित किस्म बी.टी. कपास  (Bt Cotton) को ही व्यापारिक स्तर पर उगाये जाने की अनुमति मिली है, वहीं दूसरी ओर बंगलादेश ने बी.टी. बैंगन  की खेती भी शुरू कर दी है. महाराष्ट्र सरकार ने कई फसलों का क्षेत्रीय परीक्षण (Field Trials) करने की आज्ञा दी है. इसके विपरीत अधिकांश अन्य राज्यों ने घोषणा की है कि वे आनुवांशिक  फसलों के स्थान पर जैविक कृषि को वरीयता देंगे.

पुनर्नियोजी  डी.एन.ए तकनीक (Recombinant DNA Technology) से यह संभव होता है कि वैज्ञानिक, लैंगिक बाधाओं को भी पार कर सकें और नए प्रकार के आनुवांशिक संयोगों को निर्मित करने में सफल हो जाएँ. उदाहरण के लिए, स्वामीनाथन संस्था में लवण-रोधिता (Salt -Resistance) के लिए गरान प्रजाति, एविसेंनिया मरीना , से और सूखा-रोधी जीनों को प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा  से प्राप्त कर इन्हें धान की किस्मों में सफलतापूर्वक  स्थानांतरित कर दिया गया है.  लेकिन जब तक इनके क्षेत्रीय परीक्षण  की अनुमति नहीं मिलती है, हम इस प्रकार की फसलों को उगाने के लाभ और संकटों का विश्वासपूर्वक आकलन नहीं कर पायेंगे. इसलिए कम से कम आनुवांशिक रूपांतरण फसलों के क्षेत्रीय परिक्षण पर रोक नहीं लगानी चाहिए और जहाँ तक उनकी व्यापारिक कृषि का सम्बन्ध है, वह तब तक रोका जाय जब तक आवश्यक जैव-सुरक्षा सम्बन्धी जांच पूरी नहीं हो जाती है और इनकी कृषि की अनुमति नहीं मिल जाती. इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि हमारे देश में बिना विलम्ब किये एक “राष्ट्रीय जैव सुरक्षा प्राधिकरण” (National Bio-Safety Authority) की स्थापना की जाए, जो आम जनता, विशेषज्ञों , राजनीतिज्ञों और समाचार माध्यमो का विश्वास जीत सके, साथ ही हमें और भी सार्वजनिक शोध को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है जिससे  इस प्रयोग में लायी तकनीकों को अधिक से अधिक लोग जान सकें. ज्ञातव्य है कि व्यक्तिगत कम्पनियां ऐसी तकनीकों  को प्रयोग में लाती है कि उनसे उत्पादित बीज कृषकों को प्रति वर्ष खरीदना पड़ता है और साथ ही वे अपने शोध को बौद्धिक सम्पदा अधिकारों द्वारा सुरक्षित रखती हैं. यह प्रसन्नता का विषय है कि हमारे देश के सरकारी संस्थानों के वैज्ञानिकों ने आणुविक जैविकी  एवं आनुवांशिक अभियांत्रिकी के क्षेत्रों में पर्याप्त निपुणता प्राप्त कर ली है और हमें इस ज्ञान का पूरा लाभ उठाना चाहिए. यह भी विचारणीय है कि वर्तमान में भी हम चिकित्सा, उद्योग एवं पर्यावरण तथा जैव-तकनीकी जैसे क्षेत्रों में नई तकनीकों का कोई विरोध नहीं कर रहे हैं, और न ही हम उनके उपयोग पर प्रतिबन्ध ही लगा रहे हैं.            

वस्तुतः हमारी सभी चिंताएं भोजन जैव-तकनीकी को लेकर हैं, इसलिए यह और भी आवश्यक हो गया है कि संसद द्वारा अनुमोदित एक जैव सुरक्षा नियंत्रक प्राधिकरण की स्थापना की जाये. इसकी स्थापना के उपरान्त ही हम माननीय प्रधानमन्त्री के उस सुझाव का अनुपालन कर सकेंगे कि कृषि की समग्र उन्नति के लिए हमें आणुविक जैविकी और आनुवांशिक अभियांत्रिकी के ज्ञान से प्रदत्त लाभों का पूरी तरह उपयोग करना होगा.

M S Swaminathan
Prof. M.S. Swaminathan Emeritus Chairman and Chief Mentor M S Swaminathan Research Foundation Center for Research on Sustainable Agriculture and Rural Development Web: www.mssrf.org

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