मूगा रेशम: ब्रह्मपुत्र से अलकनंदा घाटी तक

डॉ. देवेंदर प्रकाश पालीवाल

Dr. Devender Prakash Paliwal

Retd. Joint Director, Central Silk Board

उत्तराखंड राज्य 53,486 वर्ग कि.मी.क्षेत्र में फैला है जिसमें से 35,394 वर्ग कि.मी.(अर्थात लगभग 65%) वन आच्छादित है , जिसका लगभग 33% भाग सघन वन क्षेत्र कहलाता है। राज्य में कई मूल्यवान पादप प्रजातियाँ हैं, जैसे शहतूत –मोरस अल्बा  लि. (Morus alba  L.), अरंड (Castor) रिसिनस  कम्युनिस  लि. (Ricinus communis L.),  कप्पा (Tapioca) मेनीहॉट  युटिलिसिमा पोहल  (Manihot   utilissima  Pohl.), कसेरू-  हेटेरोपोनेक्स फ्रेग्रेंस (रोक्स्ब.) सीम  (Heteropanax   fragrans (Roxb.) Seem), अर्जुन-टर्मिनेलिया अर्जुना (रोक्स्ब) वाइट् एंड आर्न. (Terminalia arjuna (Roxb.) Wight & Arn.) असन-टर्मिनेलिया  टोमेंटोसा  (रोक्सब .) वाइट् एंड आर्न . (Terminalia  tomentosa  (Roxb.) Wight & Arn.), ओक की प्रजातियां, सोम-पर्सिया  बोम्बिसिन्ना  कोस्ट.  (Persea  bombycina Kost.) एवं  सुआलू,  लिट्सिया  मोनोपेटेला  रोक्स्ब. (Litsea  monopetala  Roxb.) को रेशम  उद्योग  में विविध प्रकार के प्राक्रतिक रेशमों के उत्पादन हेतु उपयोग किया जाता है।

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चित्र 1: प्राकृतिक रूप से उगे हुए मूंगा सिल्कवर्म (एन्थीरिया असामेनसिस हेलफर ) के अतिथि पादप प्रजाति (क) परसिया बाम्बीसाइना, कोस्ट (Persea. bombycina Kost (Som) (ख) लिटसिया मोनोपिटेला राक्स्ब (सोआलू) (Litsea monopetala Roxb. (Soalu)

           ऊपर वर्णित वन वृक्षों में से दो प्रजातियाँ , सोम एवं सुआलू का विशेष आर्थिक महत्व है क्योंकि इन्हें मूगा रेशम कीट, ऐन्थीरिया  असमेंसिस हेल्फेर (Antheraea assamansis  Helfer) को पालने के लिए उपयोग किया जाता है और इन्हें भारत के मात्र उत्तरी-पूर्वी क्षेत्रों में ही कृषित किया जाता है।

            विविध प्रकार के प्राक्रतिक रेशमों में मूगा अपनी भव्य सुनहरी चमक के लिए विशेष स्थान रखता है। अर्ध-पालतू, मूगा रेशम कीट, ऐन्थीरिया  अस्मेन्सिस  हेल्फर , एक बहुरूपी (Multivoltine), बहुभोजी (Polyphagous) कीट है जो आतिथेय-पादपों के लम्बे परास से भोजन ग्रहण करता है, अधिकांश प्रजातियाँ जो लौरेसी (Lauraceae) कुल की हैं, और कुछ सेलेस्ट्रैसी (Celastraceae), मेग्नोलिएसी  (Magnoliaceae), रूटेसी  (Rutaceae) एवं वेर्बेनेसी (Verbenaceae) आदि। ध्यातव्य है कि जहां पर्सिया बोम्बिसिना कोस्ट. एवं लिट्सिया मोनोपेटला रोक्स्ब. जो लौरेसी कुल की हैं, मूगा रेशम कीट की प्राथमिक आतिथेय (Primary host) हैं, तेजपात (सिनोमोमम तमाला (बुख.-हैम.) टी.नीस एवं ऐबर्म., छ्मेजम (सिन्नेमोमम औब्टूयुसीफोलियम मीसा), ग्न्सराई (सिन्नेमोमम ग्लेंडूलिफेरम माइस्न.) डिगलोटी (लिट्सिया सैलिसिफोलिया हुक.,) मेजनकरी (लिट्सिया क्यूबेबा लौर.), कठलुआ (लिट्सिया नितिडा रोक्स्ब.), पातीहांडा (एक्टिनोडेफनी औबओवेटा ब्लूम.) चम्पा (माइकेलिया चम्पका लिन्न.) बेर (जिजीफ़स जुजुबे मिल.) बज्रमोनी (जैन्थोजाइलम रहेस्ता डी.सी.) आदि, मूंगा रेशम कीट के द्वितीयक आतिथेय (secondary host) हैं।

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चित्र 2: मूंगा सिल्कवर्म के अतिथि पादप प्रजाति लिटसिया मोनोपिटेला राक्स्ब (सोआलू) (Litsea monopetala Roxb. (Soalu) के वर्ष के विभिन्न मौसमो मे विकास अवस्था (क) अवयस्क पादप (ख) पूर्ण परिपक्व पादप (ग) पुष्पीय दशा मे पादप (घ) फलयुक्त दशा मे पादप

            मूगा रेशम कीट के आतिथेय पादप एशिया के विभिन्न देशों जैसे भारत, नेपाल, बंगलादेश, बर्मा, म्यांमार, मलेशिया, इंडोनेशिया, भूटान एवं श्रीलंका में विस्तृत रूप से वितरित हैं| यह पादप उत्तरी-पूर्वी और उत्तरी भारत में भी वितरित हैं| उत्तरी भारत में यह उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भली-भांति वितरित हैं|

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चित्र 3: मूंगा सिल्कवर्म के अतिथि पादप प्रजाति पी.बाम्बीसाइना, कोस्ट (P. bombycina, Kost) का वार्षिक चक्र।

            कुछ वर्ष पूर्व तक मूगा रेशम कीट के प्राथमिक आतिथेय वृक्षों का कृषण मात्र उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र की असम की ब्रह्मपुत्र घाटी और निकटवर्ती राज्यों तक सीमित रहा है, क्योंकि यहां की जलवायु इनके लिए पूर्णतया उपयुक्त है। अत: मूगा रेशम उद्योग एक नौकरी-सघन पेशा (employment intensive occupation) है, जो  ग्रामीण एवं अर्ध-नगरीय युवकों के लिए स्वर्णिम अवसर प्रदान करता है। वर्तमान में भारत में इसका वार्षिक उत्पादन लगभग 148 मीट्रिक टन है जिसमें से असम राज्य का योगदान 126 मी.टन है। हाल ही के वर्षों में उत्तराखंड राज्य भी मूगा रेशम उत्पादक राज्यों की श्रेणी में सम्मिलित हो गया है, जहाँ वर्ष 2012-2013 में 0.4 मी.टन मूगा रेशम का उत्पादन किया गया, जो सतत रूप से बढ़ता ही जा रहा है।

            ज्ञातव्य है कि मूगा रेशम कीट के लगभग सभी आतिथेय पादप उच्च वर्षा, आर्द्र एवं तप्त जलवायु धारी क्षेत्रों में उगते हैं| उत्तराखंड के गढवाल एवं कुमायूं पर्वतीय क्षेत्र की जलवायु, उप-उष्ण कटिबन्धीय होने के कारण उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र से समानता दर्शाती है, जो ऊंचाई के अनुरूप अलग-अलग पर्वत श्रंखलाओं में भिन्नता लिए हुए है।

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चित्र 4: मूंगा सिल्कवर्म/रेशम का कीडा(एन्थीरिया असामेनसिस हेलफर ) के विकास की विभिन्न प्रवस्थाऐ (क) नर एंव मादा शलभ (Moth) (ख) अंडे (ग) रेशम कीट (घ) रेशम कीट का पालन पोषण (ड) कोकून निर्माण (च) कोकून

            गढ़वाल एवं कुमायूं दोनों ही क्षेत्रों में जलवायु उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र के समान है क्योंकि यह उत्तरी-पश्चिमी हिमालय में औसत समुद्र तल स्तर (AMSL) से 800-900 मी. ऊपर है। इन क्षेत्रों में औसत वार्षिक वर्षा 1000-3000 मिमी/वर्ष है| साथ ही अधिकतम तापक्रम 38oC है और न्यूनतम 4oC जबकि सापेक्ष आर्द्रता का परास 50-95% है जो मूंगा रेशम की आतिथेय प्रजातियों की वृद्धि के लिए अत्यंत अनुकूल है, जो असम राज्य की तुलना में अधिक सफलतापूर्वक बढ़ते हैं। इस प्रकार उत्तराखंड राज्य में मूगा रेशम के उत्पादन की भरपूर सम्भावनाएं हैं क्योंकि मूगा रेशम की दोनों ही आतिथेय जातियां कुल क्षेत्र के 0.01% को आच्छादित करती हैं लेकिन वर्तमान में अज्ञानतावश यह प्रजातियां या तो पशु चारे अथवा ईंधन के रूप में उपयोग की जाती है।

            हाल ही के वर्षों में उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र में वनस्पति को विविध कारणों से गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है इनमें से प्रमुख हैं: वन स्रोतों का अत्यधिक दोहन, प्राणी एवं वनस्पति-समूह के मूल आवासों का ह्रास और जलवायु परिवर्तन। फलस्वरूप यहां इस रेशम कीट के पालन में आंशिक गिरावट आई है क्योंकि पत्तियों की गुणवत्ता में कमी, विभिन्न कीटों (insect predators) का आक्रमण तथा जीवाणुओं, कवकों एवं विषाणुओं का विशद प्रकोप प्रतिवर्ष बढ़ते ही जा रहे हैं। इस दृष्टि से यह अत्यंत वांछनीय है कि इन अतिथेय प्रजातियों के नए आवासों की खोज की जाय। अत: उत्तराखंड की महत्ता असंदिग्ध रूप से बढ़ी है जहां वन्य आनुवंशिक स्रोतों का संरक्षण ही नहीं होगा वरन यह उत्तर-पूर्व में मूगा की कृषि में सहयोग भी प्रदान करेगा।

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