जीव विज्ञान एवं पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में गो.ब. पन्त हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान का योगदान

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डा. गिरीश नेगी एवं डा. पीताम्बर प्रसाद ध्यानी

गोविन्द बल्ल्भ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान,

G.B.Pant National Institute of Himalayan Environment and Sustainable Development 

कोसी-कटारमल, अल्मोड़ा (उत्तराखण्ड)

प्रस्तावना:

गोविन्द बल्लभ पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान की स्थापना 1988-89 में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार के एक स्वायत्त संस्थान के रूप में की गई। यह संस्थान सामाजिक, पारिस्थितिक, आर्थिक और भौतिक प्रणालियों के बीच जटिल अंर्तसंबंधों में संतुलन बनाए रखने हेतु प्राकृतिक और सामाजिक विज्ञान के नैसर्गिक संबधों पर जोर देते हुए अपने सभी अनुसंधान और विकास कार्यक्रमों में बहु-विषयक और समग्र दृष्टिकोण का अनुसरण करता है। संस्थान मुख्यालय (कोसी-कटारमल, अल्मोड़ा) भारतीय हिमालय क्षेत्र में स्थित अपनी पॉच ईकाईयों क्रमषः कुल्लू – हिमाचल प्रदेष, श्रीनगर, गढ़वाल – उत्तराखण्ड, पांगथॅाग- सिक्किम, ईटानगर- अरूणाचल प्रदेष एवं पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, नई दिल्ली में स्थापित पंचम ईकाई (पर्वतीय प्रभाग) के माध्यम से अपनी शोध एवं विकास गतिविधियाँ संचालित करता है। विगत 25 वर्षो में संस्थान द्वारा जीव विज्ञान एंव पर्यावरण संरक्षण से समबन्धित मुख्य शोध कार्यो में कृषि -वानिकी माडल प्रदर्षन, जड़ी-बूटी कृषिकरण, उपयोगी वृक्ष प्रजातियों द्वारा बंजर भूमि उपचार, वनों में जैव-विविधता का आकलन, वनस्पतियों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव, पषु चारा गुणवता, वन्य खाद्य पदार्थो की पौष्टिकता एवं प्रसंस्करण, कृषि फसलों में जैव-विविधता हा्रस, मानव-वन्य जीव संघर्ष, महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियों एवं विलुप्त प्राय वनस्पतियों का उत्तक संवर्धन, सूक्ष्म जीवों द्वारा मृदा की उर्वरा शक्ति में वृद्धि, कीट परागण का हिमालयी फसलों पर अध्ययन, जैव संसाधनों पर आधारित परम्परागत ज्ञान का संकलन, भूस्खलन रोकने के जैव-आभियांत्रिक उपाय, जलागम प्रबन्ध, मृत प्रायः जल स्रोतों के पुर्नजीवन एवं ग्रामीण कृषकों हेतु पर्यावरण मित्र एवं अल्प लागत वाली आयवर्धक तकनीकों का प्रचार-प्रसार एवं प्रषिक्षण के प्रयास प्रमुख है। उपरोक्त विषयों के अर्न्तगत जीव विज्ञान एवं पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से कुछ अत्यन्त महत्वपूर्ण शोधकार्य पर आधारित उपलब्धियों का संक्षिप्त विवरण निम्नवत प्रस्तुत है।

1. जडी-बूटीयों की गुणवता एवं उनमें उत्पादन वृद्धि :

हिमालय में पाई जाने वाली जड़ी-बूटियों एवं अन्य वनस्पतियों का मानव जीवन में अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान के मध्यनजर संस्थान द्वारा लुप्तप्राय जड़ी-बूटियों के जैव-रसायनिक संरचना एवं सामाजिक-आर्थिकी के दृष्टिकोण से अत्यन्त उपयोगी पौधों का विभिन्न परम्परागत विधियों एवं उत्तक संवर्धन (Tissue Culture) तकनीकी से इनके वृहद स्तर पर उत्पादन हेतु प्रोटोकाल वनाये गये जो कि शोधकर्ताओं एवं औषधि निर्माताओं हेतु अत्यन्त उपयोगी साबित हो रहे हैं। इन औषधि जडी-बूटीयों में मुख्यतः Aconitum balfourii, Aconitum heterophyllum, Angelica glauca, Arnebia benthami, Dactylorhiza hatagirea, Saussurea costus, Hedychium spicatum, Picrorhiza kurrooa, Podophyllum hexandrum ,Valeriana jatamansi आदि (चित्र-1) है (नदीम इत्यादि, 2001)। इसके अलावा जैव-विविधता सरक्षण एवं सामाजिक आर्थिकी की दृष्टि से महत्वपूर्ण वृक्षों जैसे बुरॉस (Rhododendron spp.), थुनेर (Taxus baccata), बांज (Quercus spp.), चाय  (Camellia sinesis), आर्किड (Dendrocalamus hamiltonii), (Habenaria edgeworthii, Rhynchostylis retusa) एवं सुगन्धित पौधों (Rosa damascena, Zanthoxylum armatum) इत्यादि  में उत्तक संवर्धन, गुणसूत्र विविधता (genetic diversity) एवं इन पौधों के हिमालय में उच्च पैदावार वाले क्षेत्रो एवं उच्च गुणवता देने वाले प्रजातियों की खोज की है (जुगरान इत्यादि, 2013)। पुनः उपरोक्त प्रजातियों के अलावा अन्य वृक्ष प्रजातियों (जैसे- Bauhinia vahlii, Olea glandulifera, Ehretia levis, Myrica esculenta, Sapium sebiferum, इत्यादि) के पुर्नजनन हेतु उनकी पत्तियों/शाखाओं में जड़ों के उद्भव एवं बीजों के अंकुरण को बढाने हेतु उनका वृद्धिकारक हार्मोन (Growth  Hormone) से उपचार किया गया एवं बीजों की सुसुप्तावस्था को तोड़ने हेतु उनका थायोयूरिया, पोटेषियम नाईट्रेट, जिबरैलिक अम्ल, सल्फयूरिक अम्ल, नैप्थलीन एसीटिक एसिड (NAA), बैन्जाईल एमीनो प्यूरीन (BAP) एवं ठण्डे एवं गर्म जल से उपचार करने से उनमें जड़ो के निकलने एवं बीजों के अंकुरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा (नन्दी इत्यादि, 2002)।

चित्र 1 :इन-विट्रो रीजेनरेषन आफ Valeriana jatamansi एंड इस्टाब्लिषमेंट आफ प्लान्टस इन सौईल (ए) मदर प्लाट आफ V. jatamansi (बी) नोडल एक्सप्लान्टस कल्चरड आन एम.एस. मीडियम (सी) इन्डक्षन आफ मल्टिपल सूट एन्ड रूट फ्राम 10 वीक ओल्ड कल्चर (डी) ट्रासर्फर आफ इन-विट्रो रेज्ड प्लोटस टू सोईल (ई) वैल डबल्पड टिषू कल्चर प्लाटेस (एफ) एक्लिमेटाईजेषन आफ प्लाटेस ईन ग्रीन हाउस एवं (जी) इस्टाब्लिस्ट टिषू कल्चर रेज्ड प्लाटेस आफ्टर सिक्स मन्थस ईन पौलीबैग।

चित्र 1 :इन-विट्रो रीजेनरेषन आफ Valeriana jatamansi एंड इस्टाब्लिषमेंट आफ प्लान्टस इन सौईल (ए) मदर प्लाट आफ V. jatamansi (बी) नोडल एक्सप्लान्टस कल्चरड आन एम.एस. मीडियम (सी) इन्डक्षन आफ मल्टिपल सूट एन्ड रूट फ्राम 10 वीक ओल्ड कल्चर (डी) ट्रासर्फर आफ इन-विट्रो रेज्ड प्लोटस टू सोईल (ई) वैल डबल्पड टिषू कल्चर प्लाटेस (एफ) एक्लिमेटाईजेषन आफ प्लाटेस ईन ग्रीन हाउस एवं (जी) इस्टाब्लिस्ट टिषू कल्चर रेज्ड प्लाटेस आफ्टर सिक्स मन्थस ईन पौलीबैग।

2.        कृषि – वानिकी, जैविक कृषि एवं खर-पतवार उन्मूलनः

पर्वतीय क्षेत्र में अधिकांश  सीमान्त किसानों के पास कृषि योग्य भूमि छितरी हुई जोतों में विभक्त होने से कृषि फसलों का उत्पादन लाभकारी नहीं रह गया है , अतः संस्थान द्वारा गढवाल में कृषि-वानिकी के प्रयोग किये गये जिसके अर्न्तगत खेतों में चारा व बहुपयोगी वृक्ष प्रजातियों (Alnus nepalensis, Albizia leebeck, Grewia optiva, Quercus spp.) के साथ कृषि फसलें (गेहूॅ एवं प्याज, लहसुन) उगाने से इनकी पैदावार में लगभग ड़ेढ़ गुना वृद्धि पाई गई (मैखुरी इत्यादि, 1997)। इसके अतिरिक्त इन वृक्षों से पशुओं हेतु न केवल पौष्टिक चारा प्राप्त हुआ अपितु ईधन, रेशा, खाद्य फल एवं भूमि की उर्वरा शक्ति भी बढ़ गई। इसी प्रकार सिक्किम के मामले में जलागम में बडी ईलायची को उतीस वृक्ष (Alnus nepalensis) के साथ उगाने से न सिर्फ इसकी पैदावार बढ़ी बल्कि उतीस द्वारा नाइट्रोजन स्थिरीकरण से भूमि की उर्वरा शक्ति में भी वृद्धि हुई। इसी प्रकार पूर्वोतर भारत में झूम खेती से प्रभावित भूमि पर सीढीनुमा खेत बनाकर उनकी मेड़ो में स्थानीय बहुपयोगी झाडियों का मिश्रित रोपण करके मृदा अपरदन में रोकथाम, वर्षा जल संरक्षण एवं पौधों की जड़ो द्वारा नाइट्रोजन स्थिरीकरण से भूमि की उर्वरा शक्ति बढाने में उपयोग को लेकर ’’कन्टूर हैजरो फार्मिग सिस्टम’’ (Contour  Hedgerow  Farming  System) नामक एक तकनीकी का विकास किया गया जिनमें स्थानीय झाडी प्रजातियॉ क्रमशः  Desmodium rensonii, Tephrosia candida, Leucaena leucocephala, Indigofera dusoa ,एवं Crotolaria tetragona उपयुक्त पाई गई (सुन्दरियाल, 2003)। ग्रामीणों के जीविकोपार्जन हेतु वन खाद्य फल-फूलों का नियन्त्रित दोहन करके आयवर्धन सम्बन्धी अध्ययनों में काफल (Myrica esculenta), बुरॉस (Rhododendron arboreum), अमेस (Hippophae salicifolia),  बेल (Aegle marmelos) के फल/फूल कई उत्पादों जैसे – जैम, जैली एवं अचार बनाने हेतु उपयुक्त पाये गये (ध्यानी एवं धर, 1994)।

पर्वतीय क्षेत्र में कृषि बंजर भूमि, वनों के कटान से उत्पन्न बंजर भूमि, सड़कों के किनारों एवं वनों के इर्द-गिर्द हानिकारक खर-पतवार जैसे – कूरी (Lantana camara), काला बॉस (Eupatorium spp.) एवं काँग्रेस ग्रास  ((Parthenium spp.) की घुसपैठ बढने से स्थानीय जैव-विविधता प्रभावित हो रही है। अतः इन खर-पतवारों के विनाश  एवं उनके उपयोग ढूढ़ने की दिशा में संस्थान ने Eupatorium  को पौलिपिट में सड़ाकर जैव उर्वरक (Bio-fertilizer) तैयार की है। इसी प्रकार उच्च नाइट्रोजन युक्त Lantana की पत्तियों का उपयोग वर्षा आधारित कृषि भूमि में पलवार (Mulching) के रूप में करने से भूमि की उर्वरा शक्ति एवं गेहूॅ व धान की वर्षा आधारित खेतों में फसल की पैदावार बढ़ने के साथ – साथ मृदा अपरदन में कमी एवं मृदा में वर्षा जल संचय में वृद्धि पाई गई (प्रमोद कुमार इत्यादि, 2009)। संस्थान के ग्रामीण तकनीकी परिसर में जैविक कृषि (Organic  Farming) को बढावा देने हेतु कैचुआ खाद (Vermicomposting) को बनाने की विधि का प्रदर्शन किया गया जो कि कृषि फसलों की बढवार एवं उत्पादकता हेतु अति उत्तम पाई गई। इसी दिशा में समन्वित मत्स्य पालन हेतु मुर्गी की खाद का इस्तेमाल तालाब में मतस्य पालन हेतु अत्यन्त उपयोगी पाया गया।  सूक्ष्मजीवों पर आधारित शोध से स्पष्ट हुआ कि इनके द्वारा ईन्जायम स्त्राव से मृदा में मौजूद फास्फोरस आसानी से विद्यटित होकर फसलों की वृद्धि में सहायक है (रिनू एवं पाण्डे, 2010)।

3.   वृक्षारोपण एवं मृदा व जल संरक्षण तकनीकी से बंजर भूमि सुधार :

यह सर्वविदित है कि हिमालयी घाटियों में घनी मानव एवं पशु  आबादी वाले क्षेत्रों में वनस्पति व वन सम्पदा पर चारापती एवं ईधन इत्यादि हेतु निर्भरता होने के कारण बड़ी मात्रा में भूमि बंजर हो चुकी है। जिससे तरह-तरह की पर्यावरणीय समस्याऐं जिनमें (प्रमुख रूप से जैव-विविधता ह्रास, मृदा अपरदन एवं भूमि में संचित जल की मात्रा का ह्रास एवं जल स्रोतों का सूखना) आ रही हैं। अतः संस्थान ने बंजर भूमि सुधार को प्राथमिकता देते हुए सम्पूर्ण हिमालयी क्षेत्र में कई स्थानों पर ग्राम समुदाय की बंजर भूमि पर उपयोगी वनस्पतियों का जन-सहभागिता से वृक्षारोपण किया (चित्र-2), जिससे जैव-विविधता एवं वृक्ष आवरण में वृद्धि के साथ-साथ वर्षा जल संचय होने से मृदा अपरदन पर भी रोक लगी। इसके साथ ही स्थानीय जनता की ईधन एवं चारे की समस्या का निदान हुआ। बंजर भूमि सुधार हेतु उत्तराखंड में जन-सहभागिता से ’’बद्रीवन, रक्षावन, कैल बकरिया वन, कालिका वन, नंदा वन, इत्यादि की स्थापना जन-भागीदारी को धार्मिक भावनाओं एवं वृक्षों के प्रति आदर एवं पर्वतों के सम्मान के साथ वृक्ष प्रसाद के रूप में जोड़ने से की गयी (ध्यानी, 2004, ध्यानी एंव पालनी, 2011, ध्यानी इत्यादि, 2011)।

चित्र - 2: लोहाघाट जिला चम्पावत के कौलीढेक ग्राम में जन सहभागिता द्वारा पवित्र वन (कैल बकरिया वन ध् कालिका वन) बंजर भूमि विकास हेतु सुधार कार्य (ए से डी तक)।

चित्र – 2: लोहाघाट जिला चम्पावत के कौलीढेक ग्राम में जन सहभागिता द्वारा पवित्र वन (कैल बकरिया वन ध् कालिका वन) बंजर भूमि विकास हेतु सुधार कार्य (ए से डी तक)।

उक्त बंजर भूमि पुर्नस्थापना कार्य हेतु उपयुक्त वनस्पतियों की पहचान क्षेत्र विशेष की पारिस्थितिकी एवं वनस्पति कार्यिकी (Eco -Physiology) पर आधारित है इस बात का भी विषेष ध्यान रखा गया है कि यह वृक्ष प्रजातियाँ स्थानीय ग्रामीणों को लकड़ी, चारा, रेशा, खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने के साथ-साथ भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में भी सक्षम हों। इन प्रजातियों में लम्बे समय के परीक्षण के उपरान्त कुछ प्रजातियाँ (उदा0 भीमल, क्वैराल, तिमिल, देवदार, बांज, उतीस, शीशम आदि) उपयुक्त पाई गई। इन बहुउद्देशीय वृक्ष प्रजातियों की विशेषता यह है कि वह बार-बार शाखाओं की कटाई के उपरान्त भी सामान्य वृद्वि करती है। इसके अलावा यह अपनी जड़ों से मिट्टी को बाधे रखती है एवं जड़ों में स्थित बैक्टिरिया युक्त गाठों से नाइट्रोजन स्थिरीकरण करके भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाती हैं।

4.  भूक्षरण एवं भूस्खलन रोकने हेतु जैव-अभियान्त्रिकी तकनीक का विकास :

वन्स्पतियाँ पारिस्थितिकी सन्तुलन हेतु नितान्त आवश्यक है। यह भली-भाति प्रमाणित हो चुका है कि पहाड़ों का वानस्पतिक आवरण हटने से भूमि अस्थिर हो जाती है एवं भूस्खलन की सम्भावना बढ़ जाती है। अतः वनस्पतियों का किसी अभियान्त्रिकी संरचना के साथ भूमि के कटाव की रोकथाम हेतु उपयोग, जैव-अभियान्त्रिक (Bio-engineering) कहलाता है। संस्थान द्वारा जैव अभियान्त्रिकी सम्बन्धित विधियों के अध्ययन के उपरान्त उपयुक्त पाई गई घास/झाड़ी/वृक्ष रोपण तकनीक को भूक्षरण व छोटे-छोटे भूस्खलन रोकने हेतु अपनाया जा सकता है। इन तकनीकों में मुख्यतः ब्रष लेयरिंग, जीवित रोक बाध, पालीसैड, फासैन, रिप-रैप ड्रैन, फ्रेंच ड्रेन, वाटेले फैन्स इत्यादि शामिल है। इन तकनीकों में घास, झाड़ी एवं वृक्षों की चयनित प्रजातियों की पौध/कटिंग को समोच्च/सीधी पक्तिवत, कर्णवत, टर्फ, बीजारोपण एवं अन्य विधि से लगाया जाता है। स्थानीय वृक्ष प्रजातियों में मुख्यतया Grewia optiva, Melia azaderach, Morus alba, Pyrus pashia, Salix tetrasperma, झाड़ीयों में  Arundinaria falcata, Dodonaea viscosa, Sapium insigne, Vitex nigundo, Woodfordia fruticosa, एवं घासों में  Duranta repens, Eulaliopsis sp, Heteropogon contortus, Pennisetum purpureum, Sacharum spontaneum इस प्रयोजन हेतु उपयुक्त पाई गई (अग्रवाल एवं रिखाड़ी, 1998)।

संस्थान के अनुसंधान एवं विकास कार्यो के उपरान्त विकसित ज्ञान एवं तकनीकी के प्रचार-प्रसार हेतु  ग्रामीण तकनीकी परिसर के माध्यम से क्षेत्रीय कृषकों, महिलाओं, स्वयं सेवी संस्थाओं,  सरकारी विभागों के अधिकारियों कर्मचारियों, पूर्व सैनिको, विद्यार्थियों इत्यादि हेतु निरन्तर प्रषिक्षण कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं, जिनमें विभिन्न माध्यमों से उत्पादन वृद्वि, आर्थिक विकास, आजीविका वृद्वि, आदि विषयों का प्रशिक्षण एवं नमूना प्रदर्शित कर विस्तृत जानकारी प्रदान की जाती है साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर उद्यमी, परिश्रमी व्यक्तियों को संसाधन भी प्रदान किये जाते है।

हिमालय क्षेत्र में पर्यावरण सन्तुलन हेतु संस्थान के नीतिगत प्रयास :

संस्थान ने सम्पूर्ण भारतीय हिमालय क्षेत्र के पर्यावरण संरक्षण एवं समन्वित विकास हेतु कई महत्वपूर्ण नीति निर्धारक दस्तावेजों को प्रकाशित किया है जिनका भारत सरकार एवं राज्य सरकारों की पर्यावरण संरक्षण नीतियों में समावेश किया जाता रहा है। इन दस्तावेजों में मुख्यतः हिमालयी परितंत्र की सततता हेतु अभिशासन  (Governance for Sustainable Himalayan Ecosystem)  नामक एक दस्तावेज अति महत्वपूर्ण है (ऐनोनिमस, 1992)।  इसके अलावा  संस्थान द्वारा प्रकाशित (Action Plan for Himalaya) एवं  ग्रामीण क्षेत्र में पर्यावरण सन्तुलन एवं इको-तंत्रो की वहन क्षमता पर केन्द्रित एक अन्य दस्तावेज ”ग्राम पर्यावरण कार्य योजना“ भी अत्यन्त उपयोगी सिंद्ध हुऐ हैं (ऐनोनिमस, 2011, कुमार आदि, 2002)। इन दस्तावेजों में हिमालय के संवेदनशील  पारिस्थितिकी तंत्र में मानव के सामाजिक-आर्थिक विकास एवं पर्यावरण संरक्षण को सुनिश्चित करने हेतु कुछ मुख्य सफल तकनीकों का समावेश किया है जिनमें मुख्यतः भूस्खलन की रोकथाम हेतु हरित सड़क निर्माण, जल स्त्रोतों एवं वर्षा जल का संरक्षण, परती भूमि का वनीकरण, जलागम प्रबन्ध,  पारिस्थितिकी संतुलन हेतु संवेदनशील विनियमित पर्यटन एवं धार्मिक पर्यटन, नगरों-कस्बों के ठोस अपशिष्ट का प्रबन्धन, जैविक कृषि, पर्वतीय शहरों की वास्तुकला/नियोजन व विस्तार, सहभागिता के आधार पर जैव-विविधता संरक्षण, वैकल्पिक ऊर्जा, सामुदायिक विकास नीतियों इत्यादि पर दिशा-निर्देश दिए हैं।

संदर्भ सूची :

1.        ऐनोनिमस, 1992. एक्षन प्लान फार हिमालया। गो.ब. पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान, कोसी कटारमल, अल्मोड़ा।

2.        ऐनोनिमस, 2011. गर्वनेन्स फार सस्टेनिंग हिमालयन इकोसिस्टम। गो.ब. पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान, कोसी कटारमल, अल्मोड़ा।

3.       ए. के. जुगरान, आई. डी. भट्ट, आर. एस. रावल, एस. के. नन्दी एवं वीना पाण्डेय, 2013. पैर्टनस  आफ मौरफोलोजिकल एण्ड जैनिटिक डाईवर्सिटी आफ Valeriana  jatamansi Jones. इन डिफरेन्ट हैविटैटस एन्ड एल्टीटूयटबल रेन्ज आफ वैस्ट हिमालया। फ्लोरा, 208 : 13-21.

4.        डी.के. अग्रवाल एवं एच.सी. रिखाड़ी, 1998. माउन्टेंन रिस्क इन्जिनियरिंग : लो कास्ट वायोलाजिकल एण्ड फिजिकल मीजर्स फार कन्ट्रोल आफ स्माल हिल स्लोप इन्सेटविलिटिज। इन : रिसर्च फार माउन्ट डेवलपमेंट : सम इनिसिएटिव एण्ड एकोम्पालिसमेंन्टस,  ज्ञानोदय  प्रकाषन, नैनीताल। पृ0 119-144

5.       के.कुमार, डी.एस. रावत, जी.सी.एस. नेगी, पी.के. सामल. वी. जोषी, जी.एस. सत्याल, ए.एस. मेहता एवं एल.एम.एस. पालनी, 2002. ग्राम पर्यावरण कार्य योजना : सामुदायिक मैनुअल। गो.ब. पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान, कोसी कटारमल, अल्मोड़ा।

6.       के. रिनू एवं अनीता पाण्डे, 2010. टैम्परेचर डिपेंडेन्ट फास्फेट सौल्यूविलाईजेषन बाई कोल्ड एन्ड पी.एच. टौलरेन्ट स्पीसीज आफ Aspergillus आईसोलेटेड फ्राम हिमालयन सौईल। माईकोसाईन्स 51 : 263-271.

7.       एम. नदीम, एल.एम.एस. पालनी, ए.एन. पुरोहित, एच. पांडे एवं एस. के. नन्दी, 2000. प्रोपेगेषन एण्ड कर्न्जेवेषन ऑफ Podophyllum hexandrum Royle एन इर्म्पाटेन्ट मेडिषिनल हर्ब। वायोलोजिकल कन्जर्वेषन 92ः121-129.

8.       पी. पी. ध्यानी एवं यू. धर, 1994. Myrica escutenta Box. Myrtle (काफल ) प्रोमिसिंग अन्डर एक्सप्लोईटेड ट्री क्रोप आफ दि हिमालया। हिमविकास आकेजनल पब्लिकेषन न. 3, जी.बी.पी.आई.एच.ई.डी., अल्मोड़ा। 33 पृ.

9       पी. पी. ध्यानी,  2004. दि वद्रीवन माडल फार रेस्टोरेषन आफ डीग्रेडेड लेंड एण्ड वायोडाईवर्सिटी कनजर्वेषन। इनः मैनजिंग माउन्टेन प्रोटेक्टेड ऐरियाजः चैलेन्जेज एण्ड रिस्पोन्सेस फार दि 21 सैन्चुरी (एडिटर्सः एच. डेविड एण्ड ग्रैमी डब्ल्यू), एन्ड्रोमीडा प्रेस पब्लिकेषन, कोलीडारा, ईटली। पृ0 192-195

10      पी.पी. ध्यानी एवं एल.एम.एस. पालनी, 2011. ईस्टब्लिषमेंट आफ रक्षावन बाई दि इन्डियन आर्मी एट धन्तोली, बद्रीनाथ। इनविस वुलैटिन 8ः12-14

11      पी.पी. ध्यानी, आर.जी. सिंह एवं एल.एम.एस पालनी, 2011. इस्टाब्लिषमेंन्ट आफ ए सेक्रेड फारेस्ट बाई लोकल कम्यूनिटीज एट कौलीढेक, लोहाघाट, इन उत्तराखंड। इनविस वुलेटिन 8ः 8-10.

12      पी. कुमार, एम. पन्त एवं जी.सी.एस. नेगी, 2009. सौईल फिजिको-कैमिकल प्रौपर्टीज एन्ड क्रौप यील्ड इम्प्रूभमेंन्ट फौलोईग लेटाना मल्चिंग एन्ड रीडयूस्ड टिलेज ईन रेनफैड क्रौपलेन्डस इन दि इन्डियन हिमालयन माउन्टेन्स। जरनल ऑफ सस्टेनेबल एग्रीकल्चर  33(6) : 636-657.

13      आर.सी. सुन्दरियाल, 2003. कन्टूर हैजरो फार्मिग इन नार्थ-ईस्ट इंडिया। इनः प्रोसीडिंगस आफ एन इन्टरनेषनल सिम्पोजियम आन माउन्टेन एग्रीकल्चर इन दि हिन्दू-कुष हिमालयन रीजन, काठमाडू। पृ. 85-90.

14      आर.के. मैखुरी, आर. एल. सेमवाल, के. एस. राव एवं के. जी. सक्सेना, 1997. एग्रोफोरेस्ट्री फार रिहेविलिटेषन आफ डीग्रेडेड कम्यूनिटी लैंडसः ए केस स्टडी इन दि गढ़वाल हिमालय, इडिंया। इन्टरनेशनल ट्री क्रोप्स जरनल 9(2) : 91-101.

15      एस. के. नन्दी, एल.एम.एस. पालनी एवं ए. कुमार, 2002. रोल आफ प्लांट टिष्यू कल्चर इन वायोडायबर्सिटी कन्जर्वेषन एन्ड इकोनोमिक डवलपमेन्ट। ज्ञानोदय प्रकाषन, नैनीताल, इंडिया। पृ0 649

Dr. Prashant Pant
डॉ. प्रशांत पंत एक शिक्षक, शोधकर्ता, एवं लेखन के रूप में दयाल सिंह महाविद्यालय में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं. उन्होंने आणविक परिस्थितिकी एवं परिस्थितिकी तंत्र में पुनर्स्थापन में पीएचडी प्राप्त किया है. उन्हें दिल्ली हिंदी साहित्य अकादमी, दिल्ली सरकार की ओर से हिंदी छात्र प्रतिभा पुरुस्कार से सम्मानित किया गया है.उनके अन्य रूचिकर विषय वानिकी, लेग्युम फाइलोजेनी, एवं जैव-सूचना विज्ञान हैं. वर्तमान में वे दिल्ली यूनिवर्सिटी के अंतर्गत एक डिग्री कॉलेज में सहायक प्रोफ़ेसर के पद पर नियुक्त हैं. इसके अलावा वे कई अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रों तथा ऑनलाइन जर्नल “बायोइन्फरमेटिक्स रिव्यु” के मुख्य कार्यकारी संपादक के रूप में कार्यरत हैं.

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