भारत के उत्तराखंड राज्य में दावानल की बढ़ती घटनाएं: कारण, क्षति एवं शिक्षा

लेखक: डॉ. नरेन्द्र नाथ दलेई

Author: Dr. Narendra Nath Dalei

Department of Economics & International Business, University of Petroleum and Energy Studies, Dehradun-248007 (India), E-Mail: [email protected]; [email protected]

अनुवाद एवं संपादन: डॉ. प्रशांत पंत और डॉ. अरुण कुमार मौर्या
Translated and Edited by: Dr. Prashant Pant and Dr. Arun Kumar Maurya
Citation: Dalei, N.N., 2016. भारत के उत्तराखंड राज्य में दावानल की बढ़ती घटनाएं: कारण, क्षति एवं शिक्षा. Swadeshi Vigyan, Volume 1, Issue 2 (May), Article No. 2. ISSN (Online): 2456-0855.  (Article available at http://swadeshivigyan.com/nndaleiforestfires/)
Article Received: 14th May 2016, Published: 31st May 2016
सार (Abstract)

दावानल (Forest Fires) अब एक आम घटना हो गई है और लगातार बढ़ते तापमान और वैश्विक तापन (global warming) के प्रभाव के कारण भविष्य में ये घटनाएं और अधिक बढ़ने की संभावना है. जलवायु से संबंधित प्रतिबल (stress) भी काफी बढ़ गया है. पिछले 25 वर्षों में (1990-2015) वैश्विक वन-क्षेत्र (global forest cover) में लगभग 3% (तीन प्रतिशत) की गिरावट देखी गयी है[1]. इस प्रकार जंगल की आग एक गंभीर समस्या के रूप में उभर कर सामने आई है जिससे पारिस्थितिकी और जैव विविधता को बहुत बड़ा खतरा है. उत्तराखंड के वर्तमान दावानल सहित भारत में जंगल की आग अधिकांश रूप से मानवजनित है और इसके संपूर्ण कारणों का पता लगाया जाना बाकी है. हालाँकि मोटे तौर पर, शुष्क मौसम, कम मौसमी बारिश और वाष्प दाब घाटा (Vapour Pressure Deficit), चीड़ वृक्ष (Pinus spp.) के सुईदार पत्तियों (Needles) का अति-ज्वलनशील (highly inflammable) स्वभाव होना, स्थानीय लोगों द्वारा फसलों के अनुपयोगी भाग से निर्मित कूड़े को जलाना (crop refuse-litter burning), निर्वनीकरण करना (deforestation), और साथ ही अस्थिर वन संरक्षण नीति (forest conservation policy), ये सभी दावानल के लिए जिम्मेदार हैं. दावानल की रोकथाम के लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के समन्वित प्रयासों (co-ordinated efforts) द्वारा मजबूत योजना और नीति का कार्यान्वयन (policy implementation) को लम्बी अवधि तक प्रचालन एवं निगरानी में रखना होगा.

1. भूमिका (Introduction)

         दावानल अब एक आम घटना हो गई है और ऐसा माना जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन (climate change) और वैश्विक तापन के प्रभाव के कारण हाल के दिनों की तुलना में ये घटनाएं और अधिक बढेंगी. जलवायु तथा अन्य संबंधित प्रतिबलों (उदाहरण के लिए, कीट, रोग, और अग्नि) में भी नाटकीय रूप से इस सदी के दौरान विश्व स्तर पर वृद्धि हुई है,  जबकि पश्चिमी अमेरिका एवं अन्य जगहों पर उत्पादकता दरों में गिरावट आई है[2]. विश्व स्तर पर कुल वन क्षेत्र में 129 मिलियन हेक्टेयर से अधिक की गिरावट आई है[1]. इसमें भी शेष वनक्षेत्र का लगभग 35% प्राथमिक जंगल (primary forest) है और इसीलिए द्वितीय जंगल (secondary forest) जैव-विविधता संरक्षण (Biodiversity conservation), जलग्रहण संरक्षण (watershed conservation), जलवायु नियंत्रण (climate control), और पारिस्थितिक सेवाओं (ecological services) को उपलब्ध कराने के लिए अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण हैं[3]. हालाँकि, वैश्विक वनक्षेत्र में 1990 के बाद से 3% की गिरावट आई है,  लेकिन मानव द्वारा वनारोपण से जंगल के क्षेत्र में दुनिया के सभी देशों में वृद्धि हुई है और वे अब वैश्विक वन भूमि के लगभग 7% हिस्से में आतें हैं[1]. इस दृष्टि से, दावानल को एक गंभीर समस्या के रूप में माना गया है, जो पारिस्थितिकी और जैव विविधता के लिए घातक है.

         प्राग ऐतिहासिक काल (Pre-historic times) से ऐसा माना गया है कि दावानल मुख्य रूप से बिजली गिरने (thunderstrikes) की वजह से होता है, परन्तु भारतीय सन्दर्भ में दावानल बिजली गिरने के कारण कम वरन मानव-जनित घटनाओं एवं प्रतिरोधात्मक दखलंदाजी के कारण ज्यादा होता है. उत्तराखंड सहित भारत में दावानल प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से मानवजनित ही है, हालाँकि इसके सटीक कारणों का अभी तक पता लगाया जा रहा है. सामान्य जन कदाचित दावानल के दूरगामी परिणामों से अनभिज्ञ हैं और यही कारण है की वे निहित स्वार्थसिद्धि के लिए अल्पकालिक लाभ को देखते हुए इस प्रकार की दावानल जैसी घटनाओं को आमंत्रित कर देते हैं. स्थानीय निवासी वन तथा वन्य उत्पादों (forest produce) पर निर्भर रहतें हैं और उनसे ही अपनी आजीविका चलाते हैं. एक बार अगर किसी स्रोत से अग्नि का प्रवेश यदि वनों में होता है तो यह दावानल भीषण रूप ले लेता हैं जिससे स्थानीय निवासियों कि आजीविका का संकट भी उत्पन्न हो जाता है.

2. उत्तराखंड में दावानल- एक केस अध्ययन

         दावानल की हाल की घटनाओं का अवलोकन करें तो यह साल भारत के लिए बहुत खराब रहा है और उत्तराखंड में यह पहले से कहीं ज्यादा खराब रहा. आग से 13 जिलों में वन क्षेत्र का लगभग 4,000 हेक्टेयर जलकर राख हो गया, 9 लोग मारे गए एवं 17 घायल हुए तथा जैव-विविधता और वन पारिस्थितिकी प्रणालियों को भी भारी मात्र में नुक्सान पहुँचा. अप्रैल 2016 के दौरान उत्तराखंड में दावानलों की आवृत्ति (frequency) पिछले वर्ष की तुलना में काफी ज्यादा और बड़े पैमाने पर रही (तालिका 1).

तालिका 1

तालिका 1: अप्रैल 2015-2016 के दौरान उत्तराखंड के वनों में वन दावाग्नि संख्या (forest fire points) की आवृत्ति. स्रोत: फारेस्ट सर्वे ऑफ़ इंडिया (forest Survey of India) (8th May, 2016 को लिए गए आंकड़ों के अनुसार).

चित्र 1: अप्रैल 2015-2016 के दौरान उत्तराखंड के वनों में वन दावाग्नि संख्या की आवृत्ति. स्रोत: फारेस्ट सर्वे ऑफ़ इंडिया (forest Survey of India) (8th May, 2016 को लिए गए आंकड़ों के अनुसार)

चित्र 1: अप्रैल 2015-2016 के दौरान उत्तराखंड के वनों में वन दावाग्नि संख्या की आवृत्ति. स्रोत: फारेस्ट सर्वे ऑफ़ इंडिया (forest Survey of India) (8th May, 2016 को लिए गए आंकड़ों के अनुसार)

तालिका 1 और चित्र 1 के अनुसार, अप्रैल 2015 के दौरान वन दावाग्नि संख्या केवल दो जिलों, नैनीताल और उधम सिंह नगर में 1 एवं 6 अंकों के साथ पहचाने गए थे, जबकि वर्तमान वर्ष 2016 में दावाग्नि न केवल 13 जिलों में फैली वरन पौड़ी गढ़वाल में इसकी आवृति सबसे ज्यादा मापी गयी. इस प्रकार कुल 1270 घटनाओं में से 32% पौड़ी गढ़वाल में हुए जिसके बाद 22% दावाग्नि आवृत्ति संख्या के साथ नैनीताल दूसरी संख्या पर रहा.

2.1 दावानल के कारण (Causes of forest fires)

पर्यावरण और जलवायु वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि वर्तमान वर्ष के दावानलों के मुख्य कारण उच्च तापमान,  वायुमंडलीय नमी में कमी और अनावृष्टि रहे है. ऐसे तथ्य भी सामने आये है जिससे कुछ वैज्ञानिकों ने यह माना है कि आग लगने और अधिक तेजी से फैलने का एक कारण गर्मी के मौसम के दौरान संक्षिप्त वर्षा (brief rainfall) का होना भी है जिससे जंगल में लकड़ी व झाड़ियों में नमी का स्तर नीचा हो जाता है. वैज्ञानिकों का यह भी मानना ​​है अल नीनो (El Nino) का भी जंगल की आग में महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है. जलवायु परिवर्तन के कारण सतही हवा का तापमान काफी बढ़ जाता है जो अन्य कारकों के साथ अंतराकर्षण (interact) करके आग को प्रज्जवलित करने व फ़ैलाने का कार्य करता है. शुष्क मौसम एवं उच्च तापमान के साथ बढते सतही वाष्प दाब घाटा, लकड़ियों एवं झाड़ियों को जल्दी सुखाकर उन्हे ईंधन (fuel) या जलावन (fire hazard material) की शक्ल दे देता है और ऐसा खुला पड़ा ईंधन किसी भी जंगल के लिए भीषण आग का खतरा (fire hazard) बनता है. इस प्रकार शुष्क मौसम, कम मौसमी बारिश और वाष्प दाब घाटा, और साथ में चीड़ वृक्ष (Pinus spp. tree) की सुईदार पत्तियों जैसा जलावन, एवं स्थानीय लोगों द्वारा अनेकानेक गैर-सतत क्रियाकलाप (non-sustainable activities) एवं अस्थिर वन संरक्षण नीति मिलकर दावानल के लिए जिम्मेदार हैं.

2.2 उत्तराखंड में वन दावानल से होने वाली क्षति (Damages due to forest fires in Uttarakhand)

दावानल से उत्तराखंड के 13 जिलों में वृक्ष सम्पदा, पारिस्थितिकी तंत्र एवं मानव और पशु जीवन को बहुत नुकसान हुआ है. तालिका 1,  चित्र 1, और 2 हाल में हुए दावानलों के दृश्य व सम्बंधित आंकडें दर्शातें है जिनके कारण राज्य की कई स्तरों पर क्षति हुई है. इनमे पौड़ी गढ़वाल, नैनीताल और टिहरी गढ़वाल सबसे ज्यादा प्रभावित जिले रहे. पारिस्थितिकी विज्ञानी और पर्यावरण वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि इस आग से सबसे ज्यादा हिमालय के हिमपिंड (glaciers) गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं. मसलन, उड़ता धुआं, राख एवं कार्बन कण (Carbon Particles) इन हिमपिण्डो में एकत्रित होते हैं और इन पिंडों की तापमान को अवशोषित करने की क्षमता बढ़ाते हैं जिससे जमी बर्फ और अधिक तेज़ी से पिघलती है. इससे निकट भविष्य में पारिस्थितिकी में असंतुलन होने के कारण नकारात्मक प्रभाव व आसपास के क्षेत्रों में हादसों की समस्या उत्पन्न होगी. साथ ही इस तरह के कार्बन कणों के हिम पर जमा होने के कारण उत्तरी भारत की नदियां जिनकी उत्पत्ति इन्ही पिंडों से होती है, अब इन हानिकारक रसायनों को साथ में लेकर आएँगी जिससे जल प्रदूषण और बढ़ेगा.

चित्र 2: उत्तराखंड के जंगलों में हाल ही में लगी जंगल की आग का दृश्य (स्रोत: www.ndtv.com)

हाल के दो महिनो में हुई जंगल की आग से न केवल मानव जीवन की हानि हुई अपितु वनस्पति, जीव-जंतु (वन्य एवं पालित) का भी बहुत नुक्सान हुआ है. राज्य और केंद्र सरकार के द्वारा लगभग 10,000 अधिकारियों और निवासियों को आग बुझाने के लिए तैनात किया गया था. इसके अलावा, पर्यटन व्यवसाय जोकि उत्तराखण्ड जैसे राज्य की प्रमुख आय का स्रोत है उसको भी बड़ी मात्रा में क्षति पहुंची.

3. दावानल: बाकी विश्व से सीख (forest fires: lessons from rest of the world)

अग्नि शमन के लिए समर्पित बड़े खर्चे तथा पर्याप्त बुनियादी सुविधाओं के होने के बावजूद पिछले एक दशक से जंगल में आग से जलने वाले वन क्षेत्र में बढोतरी ही देखी गयी है. दावानल पीड़ित वनीय क्षेत्र में कमी लाने के लिए, एक रिपोर्ट के तहत यह कहा गया है कि पश्चिमी संयुक्त राज्य अमेरिका को दीर्घकालीन, संघीय और राज्य सरकार स्तर पर समन्वित प्रयास करने होंगे जिसमे भूमि प्रबंधन एजेंसीज और जनता के बीच एक सुदृढ़ भागीदारी करनी होगी ताकि दावानल रोकने हेतु एक सहयोगी योजना और समर्पित कार्यशैली का विकास हो सके[4].

कनाडा के वन्यभूमि में आग रणनीति के प्रति एक विचार है कि कनाडा में वनभूमि में आग प्रबंधन के लिए एक नया समेकित दृष्टिकोण होना चाहिए जिसमे व्यवहार में परिवर्तन और व्यक्तियों के कार्यों, हितधारक समूहों (stakeholders groups), निजी क्षेत्र (private sectors),  और सरकारों की सहभागिता होती है[5]. अंतर्निहित सिद्धांत यह है कि वनभूमि में आग से जोखिम के प्रबंधन और एकीकृत सहकारी कार्रवाई की आवश्यकता होगी जोकि एक साझा जिम्मेदारी है[5]. संयुक्त राज्य अमेरिका के दावानलों एवं आग संदमन पर अध्ययन कर रहे बेर्री महोदया (2007)[6] ने कहा है कि जब तक आग संदमन के लिए एक अनिश्चित अथवा असीमित फण्ड (Blank Check) उपलब्ध   नहीं होगा तब तक आपात स्थितियों में दावानल का व्यापक संदमन नहीं हो पायेगा. बेर्री के अनुसार आग की समस्याओं को हल करने के लिए कोई एक सरल उपाय नहीं है क्योंकि पारिस्थितिक तंत्र विविध और लगातार बदल रहे हैं. आग की भूमिका, सभी भूदृश्यों (landscape) या प्रजातियों के लिए एक जैसी नहीं है. इसीलिए, एक सफल आग नियंत्रण नीति में स्थानीय भागीदारी का एक बड़ा हिस्सा शामिल करना चाहिए.

वन परिधि में कृषि गतिविधियाँ एक संभावित अग्नि स्रोत (मलबे और कृषि कचरों का जलना, आदि) के कारण के रूप मं कार्य करते हैं.  इस प्रकार आग को वन की तरफ बढ़ने से रोकने के लिए ऐसे ज्वलनशील वस्तुओं की कमी करने का प्रयास होना चाहिए[7]. दावानल के कई प्रमुख कारण हैं, जिसमे मानवजनित दावानल एक प्रमुख कारण है उदाहरण स्वरुप पुर्तगाल तथा यूरोप में दावानल की घटनाएं[8].

वन की आग को रोकने के लिए तीन प्रमुख आधार माने जाते हैं. प्रत्येक आधार को पृथक एजेंसी में कार्यान्वित किया जाना चाहिए जैसे संरचनात्मक रोकथाम, निगरानी, आग पहचान (Fire Identification) और विधि प्रवर्तन तथा आग संदमन (Fire Suppression). ब्रिटिश कोलंबिया वन्यभूमि अग्नि प्रबंधन रणनीति ने सकारात्मक वनीय आग प्रबंधन योजना बनायीं है[9]. इस प्रसिद्ध रणनीति के पूर्ण रूप से लागू हो जाने पर वनीय आग से प्रभावों की कमी, अवसंरंचना तथा समुदायों पर पूर्ण उत्पन्न दुष्प्रभाव में कमी, स्वस्थ तथा सशक्त परितंत्र का निर्माण होगा यह तब तक संभव नहीं है जब तक स्थानीय लोगों का सहयोग प्राप्त न हो[9].

निष्कर्ष (Conclusions)

वनीय आग वैश्विक प्रभाव के साथ एक स्थानीय मुद्दा है, जिसमे वैश्विक तापन तथा जलवायु प्रभाव के कारण बढते रहने के आशा है. यद्यपि उत्तराखंड के जंगलो की आग के लिए मानवीय कारणों की भूमिका को प्रमुख माना  गया है लेकिन इसके लिए प्राकृतिक कारणों ने भी समान योगदान दिया, जिसके कारण वहां भारी मात्रा में जैव-विविधता, मानवीय जीवन तथा पर्यावरण को क्षति पहुंची.

सन्दर्भ (References)

  1. Birdsey, R., & Pan, Y. (2015). Trends in management of the world’s forests and impacts on carbon stocks. Forest Ecology and Management journal, 355, 83–90.
  2. Cohen, W., Yang, Z., Stehman, S., Schroeder, T., Bell, D., Masek, J., et al. (2016). Forest disturbance across the conterminous United States from 1985–2012: The emerging dominance of forest decline. Forest Ecology and Management journal, 360, 242–252.
  3. Abbas, S., Nichol, J. E., & Fischer, G. A. (2016). A 70-year perspective on tropical forest regeneration. Science of the Total Environment, 544, 544–552.
  4. Stephens, S. L., & Ruth, L. W. (2004). FEDERAL FOREST-FIRE POLICY IN THE UNITED STATES SCOTT. Ecological Applications, 15, 532-542.
  5. The Canadian Wildland Fire Strategy Assistant Deputy Ministers Task Group. (2005). Canadian Wildland Fire Strategy : A Vision For An Innovative And Integrated Approach To Managing The Risks. Edmonton, Alberta T6H 3S5: Canadian Council of Forest Ministers.
  6. Berry, A. (2007). Forest Policy Up in Smoke: Fire Suppression in the United States. Property and Environment Research Center.
  7. (1993). International Handbook on Forest Fire Protection. France: Food And Agriculture Organization Of The United Nations.
  8. Mateus, P., & Fernandes, P. (2016). Forest Fires in Portugal : Dynamics , Causes and Policies. In F. Reboredo (Ed.), Forest Context and Policies in Portugal (Vol. 19, pp. 1-15). Portugal: Springer.
  9. BRITISH COLUMBIA. (2010). Wildland fire management strategy. British columbia: british columbia.
Narendra N. Dalei

Dr. Narendra N. Dalei completed his Ph.D in 2011 from University of Delhi in the area of Ecological and Environmental Economics. Presently, he is working as Assistant Professor (Sr. Scale) at University of Petroleum and Energy Studies (UPES), Dehradun. He is the Programme Coordinator of Energy Economics Programme of the University. He is an ecological economist by training. He is reviewer of “Energy Policy”, Elsevier. He received certified reviewer award during 2014 and outstanding reviewer award during 2015 from “Energy Policy”, Elsevier. Dr. Dalei is the Co-Editor of “A Souvenir on Hydro Power in Uttarakhand, 2016” and “Energy Infrastructure and Transportation: Challenges and Way Forward”, Conference Proceedings, ISBN: 978-194343889-1, ICMI 2016. Dr. Dalei served as Co-Convener and Review Committee Member, International Conference on Management of Infrastructure, 2016. He also served as Co-Programme Convener, Management Development Programme of Demand Forecasting at UPES. Dr. Dalei is life member of Indian Society for Ecological Economics (INSEE), South Asian Network for Development and Environmental Economics (SANDEE), The Indian Econometric Society (TIES) and International Society for Ecological Economics (ISEE). Prior to joining UPES, Dr. Dalei worked in various positions at University of Delhi and its Constituents colleges, IGNOU, FICCI, Zenith Energy and NSSO, MOSPI.

Dr. Dalei has around 14 years of industry, research and teaching experience. He has published 12 papers in national and international journal of repute and contributed 13 book chapters/modules to UGC ePG Programme to his credit in the areas of economics, ecological economics, energy and environment. He attended and presented papers in 8 national and international conferences.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *