मानव श्वसन-तंत्र में ऐस्परज़िलस फ्लेवस कवक की विद्यमानता

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डॉ अनुभा जोशी

मेडिकल मायकोलोजी सम्भाग, वल्लभ भाई पटेल चेस्ट संस्थान, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली-110007

मानव के वक्ष से सम्बद्ध रोगों में श्वसन कवकताओं (Respiratory Mycoses) ने शनै: शनै: व्यापक महत्व धारण कर लिया है. वल्लभ भाई पटेल चेस्ट संस्थान, दिल्ली विश्वविद्यालय, में संपन्न सतत अनुसंधानों से पता चला है कि इस रोग की विभिन्न दशाओं का मुख्य कारक, ऐस्परज़िलस फ्लेवस (Aspergillus flavus) नामक एक कवक (fungus) है, जिसके द्वारा अनेक प्रकार की श्वसन विकृतियाँ (respiratory disorders) उत्पन्न हो जाते है, जिन्हें विशेषतः एसपरज़िलोसिस (Aspergillosis) अथवा एलार्जिक ब्रोंकोपल्मोनरी एसपरज़िलोसिस (Allergic Broncho-Pulmonary Aspergillosis, ABPA) की संज्ञा दी जाती है. दमा, श्वास, हाफना, श्वास लेने में तकलीफ और अंततः ज्वर इसके सामान्य लक्षण है. रुधिर रोगों (Blood Related disorders and diseases) से पीड़ित  मरीजों  में तो यह मृत्यु का कारण भी बन सकती है. ह्रदय-फेफड़े (सामूहिक अथवा एकल), अस्थिमज्जा (Bone marrow), अथवा वृक्क (Kidney) जैसे महत्वपूर्ण अंगों का प्रत्यार्पण (transplant) करवा चुकने के उपरान्त  स्वास्थ्य लाभ की ओर अग्रसर रोगी क्रमशः घटते क्रम में इस कवक द्वारा संक्रमित होते हैं. वैसे “एड्स” (AIDS) से पीड़ित रोगी भी इसी श्रेणी में आते हैं.

भारत में ऐस्परज़िलस फ्लेवस  के प्रकोप की प्रथम सूचना 1971 में फेफड़ों के कैंसर के रोगी की मृत्योपरांत जांच के आधार पर की गयी, जिससे श्वास-तंत्र में इस कवक का एक गेंद-रुपी गुच्छा पाया गया. बाद में तलवार एवं सहयोगियों (1982) एवं चक्रवर्ती एवं सहयोगियों (1992) के सतत अध्ययनों  से पता चला कि भारत के उत्तर पश्चिमी अंचल में व्याप्त प्रत्यूर्जता नाडी-नासूर (Allergic sinusitis) का कारण यह प्रजाति एवं अन्य निकट सम्बन्धी कवकें ही थी.

शोध के अंतर्गत 409 ऐसे रोगियों का परीक्षण, जो विविध प्रकार और सीमा तक श्वास रोग से पीड़ित थे, की श्वास प्रणाली में,  ऐस्परज़िलस फ्लेवस की विद्यमानता के लिए किया गया था. इनमे से अधिकान्श क्लिनिकल शोध केंद्र, वल्लभ भाई पटेल चेस्ट  संस्थान, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली में पंजीकृत थे. अन्य को दिल्ली/नई दिल्ली स्थित विविध अस्पतालों/संस्थानों द्वारा परामर्श हेतु यहाँ संदर्भित किया गया था. इनमें सम्मिलित  थे: राजन बाबू टी बी अस्पताल, दिल्ली; अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली; राम मनोहर लोहिया अस्पताल, नई दिल्ली; लोक नायक जय प्रकाश अस्पताल, नई दिल्ली; लाला राम इंस्टिट्यूट ऑफ़ ट्यूबरक्लोसिस एवं रिलेटेड दीसीसेज़, नई दिल्ली; सर गंगाराम अस्पताल, नई दिल्ली; जयपुर गोल्डन अस्पताल, नई दिल्ली; एवं एम्प्लाइज स्टेट इन्स्योरंस अस्पताल, नई दिल्ली;. इसके अतिरिक्त मेरठ के अस्पतालों द्वारा परामर्श हेतु भेजे गए कुछ रोगी भी सम्मिलित थे. रोगियों में 234 पुरुष एवं 155 स्त्रियाँ थी. कुल मिलाकर इन रोगियों से 55 क्लिनिकल नमूने (Clinical Samples) एकत्र किये गए थे और इनसे रोग फैलाने वाली कवक की सूक्ष्मदर्शीय (Microscopic) एवं संवर्धन माध्यम (Culture medium) में उगाकर जांच की गयी. इनमें 471 नमूने रोगियों की लार/थूक के, 48 श्वास नलिका के, 22 नाक की त्वचा से बहते हुए तरल के, और 2 मस्तिष्क तंत्रिका के तरल के थे. साथ ही कवकों कि प्रतिरोधी क्षमता की जांच के लिए 376 रोगियों के रक्त के नमूनों  को भी परखा गया था.

वर्तमान शोध में रोगियों की प्रयोगशाला एवं नैदानिक जाँच के उपरान्त 48 एसपरज़िलोसिस से ग्रस्त रोगियों की भी पहचान की गयी. इनमें से 35 रोगी तो प्रत्यूर्जता श्वास नली, फुक़फुसीय एसपरज़िलोसिस (ABPA) से पीड़ित थे जबकि 2 एस्परर्ज़िलस नाडी-नासूर से प्रभावित थे. शेष में अन्य विविध प्रकार के लक्षण पाए गए. स्पष्ट है कि ऐस्परज़िलस फ्लेवस से प्रभावित होने वाले रोगियों की संख्या में निरंतर वृद्धि हुई है.

शोध यह भी इंगित करता है कि  चिकित्सकों (Physicians), विकिरण-विदों (Radiologist) एवं सूक्ष्म-जीव विज्ञानियों (Microbiologist) के बीच बेहतर ताल-मेल की आवश्यकता है ताकि इस कवक द्वारा प्रभावित होने वाले रोगियों की पहचान प्रारंभिक अवस्थाओं में ही हो सके. इस क्रम में कवक द्वारा रोगी के शरीर में संश्लेषित किये जाने  वाले अणुओं की “जीवें” (in vivo) परख सबसे कारगर विधि है, क्योंकि अभी तक इसके विशिष्ट लक्षण और चिन्ह सम्मुख प्रकट नहीं हुए हैं. साथ ही सूक्ष्मजीव वैज्ञानिकों को पहले से कहीं अधिक सुग्राही (sensitive) और विशिष्ट  साधनों को विकसित करना होगा. चिकित्सालयों के वातावरण की वायु में विचरण करने वाले कोनिडिया (Conidia/Conidial Spores) की पहचान और उनकी मात्रा की भी समय-समय पर जांच होती रहनी चाहिए. इस दिशा में  इस कवक प्रजाति की प्रतिरोध क्रियाविधि (Resistance mechanisms) का गहन अध्ययन किया जाना तीसरा महत्वपूर्ण कार्य है.

 

 

 

डॉ. अनुभा जोशी

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