“विज्ञान स्तंभ जे.एन.यू से”- प्रोफेसर उमेश कुलश्रेष्ठ, वरिष्ठ स्तंभकार, स्वदेशी विज्ञान द्वारा संयोजित

काली धुन्ध

मनीषा मिश्रा एवं उमेश कुलश्रेष्ठ

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, भारत, ११००६७

धुंध (Haze) पारंपरिक रूप से एक ऐसी वायुमंडलीय घटना है जो प्रायः शहरी क्षेत्रों में पाई जाती है, जहां धूल, धुआं और पर्यावरण प्रदूषक के रूप में निकले अन्य सूखे कण आकाश की स्पष्टता को कम करते हैं. ‘धुन्ध’ शब्द का अर्थ है धुँआ और कुहरे का मिश्रण. धूल, धुँआ एवं अन्य हानिकारक कण मिलकर एक काला मिश्रण बनाते हैं जो काली धुन्ध सा प्रतीत होता है. औद्योगिक कारखानों, यातायात, जंगल की आग एवं शुष्क मौसम में खेती, इत्यादि, इन हानिकारक कणों के मुख्य श्रोत हैं. धुन्ध प्रायः उच्च ताप पर जलने वाले इंधनों से निकलने वाले कणों एवं वायुमंडल में होने वाली विभिन्न रासायनिक अभिक्रियाओं से बनता है. जो बहुत सी स्वस्थ्य सम्बन्धी बीमारियों को जन्म देती है. हवा में तैरते ये हानिकारक कण या एरोसोल्स (Aerosols), वायु को ज़हरीला कर देते हैं और हमारी जलवायु पर गहरा प्रभाव डालते हैं.

दहन के दौरान उत्सर्जित गैसें या कण, जैसे की SO2, NO2, HCs, ब्लैक कार्बन, कालिख (Soot) इत्यादि प्रायः वायु में  जटिल रासायनिक अभिक्रियाओं से छोटी बूँद या कणों के रूप में परिवर्तित होकर हवा में तैरते रहते हैं, जिन्हें एरोसोल्स कहते हैं. अपेक्षाकृत शुष्क या नम मौसम में इनका प्रसार रुक जाने से आम तौर पे ये प्रदूषक हवा में एकत्रित होने लगते हैं जिससे एक नीचे लटकती हुयी काली या धुंधली सी परत बन जाती है जो वायु की पारदर्शिता को कम करती है और सांस सम्बन्धी बीमारियों के खतरे को बढ़ाती है. धूप,उच्च सापेक्ष आर्द्रता एवं स्थिर हवा जैसी परिस्थितियों में इन अभिक्रियाओं की दर कई गुना बढ़ जाती है.

धुंए के साथ निकली हुयी कालिख या ब्लैक कार्बन, अनुकूल परिस्थितियों में अन्य प्रदूषकों के साथ मिलकर काले कुहरे सा मिश्रण बनाता है जिसे काली धुन्ध कहते हैं. कालिख का उत्सर्जन  प्रायः जीवाश्म या जैविक इंधनों के अधूरे दहन से होता है. औद्योगिक कार्यों में दहन, स्टोव में खाना पकाने और बायोमास दहन, डीजल वाहनों एवं जंगल की आग, वायु में ब्लैक कार्बन की सांद्रता बढ़ाती है. मानवता से प्रति वर्ष १७ लाख मीट्रिक टन ब्लैक कार्बन का उत्सर्जन वायुमंडल में होता है, जिसका इकाई द्रव्यमान कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कई गुना गर्मी को रोकता है. IPCC (२०१३) की रिपोर्ट के अनुसार, CO2 के बाद ब्लैक कार्बन ग्लोबल वार्मिंग में योगदान करने वाला दूसरा सबसे बड़ा प्रदूषक है.

 काली धुन्ध के स्रोत

१). परिवहन– यातायात, जैसे की बस, ट्रक एवं अन्य ऑटोमोबाइल से होने वाला उत्सर्जन, अनुकूल वातावरण में धुन्ध के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. वाहनों से उत्सर्जित होने वाला धुआं बड़े शहरों में धुन्ध के निर्माण प्रक्रिया में भाग लेने वाले प्रमुख घटकों में से एक है. परिवहन से निकलने वाले प्रदूषक जैसे की कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), नाइट्रोजन ऑक्साइड्स (NOx), वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs), सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) और हाइड्रोकार्बन्स (HCs), धूप एवं नमीयुक्त वातावरण में विभिन्न प्रकार की रासायनिक अभिक्रियों से हानिकारक वाष्प, परॉक्सी एसिटिल नाइट्रेट (PANs) और ज़मीनी स्तर की ओजोन बनाते हैं, जो धुन्ध में शामिल होने वाले प्रमुख घटक हैं.

२). कोयला दहन– भवनों और इमारतों को गरम करने या बिजली संयंत्रो (Power plants) में होने वाला कोयला दहन से निकालता धुआं धुन्ध के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देता है. कोयला दहन सन १९५२ में लन्दन के भयावह वायुप्रदूषण की धुन्ध की घटना का प्रमुख अपराधी है. आज भी कोयले को प्रमुख इंधन के रूप में इस्तेमाल करने वाले क्षेत्रों में यह घटना प्रायः देखने को मिल जाती है. हाल ही में, सन २०१३ में, चाइना के कुछ शहरों में इस प्रकार का प्रदूषण एक गंभीर समस्या के रूप में नोटिस किया गया है.

 

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चित्र संख्या-१. ब्लैक कार्बन के विभिन्न स्रोत (US_EPA द्वारा प्रकाशित)

३). जैविक इंधन– आज भी एशिया के कई देशों की ५०% से अधिक जनसँख्या गाओं में रहती है जो सबसे ज्यादा जैविक इंधनों का इस्तेमाल करते हैं. जैविक इंधनों जैसे की सूखी लकड़ियों, पौधों के अवशेष, गोबर के कंडे इत्यादि के दहन से निकलने वाली कालिख ऐसे वातावरण में रहने वाले लोगों के लिए कैंसर के खतरे को बढ़ाती है. जैविक सामग्री के दहनों से निकलने वाला धुआं और ब्लैक कार्बन, एशियाई भूरा बादल (Atmospheric Brown Clouds) का प्राथमिक कारक है. उपग्रहों से प्राप्त तस्वीरों में यह बादल प्रति वर्ष जनवरी से मार्च के मध्य हवा में तैरते एक विशाल भूरा धब्बे के समान दिखाई देता है  जो दक्षिण एिशया के  अिधकांश और हिन्द महासागर के  उत्तरी भाग को ढके रहता है. ब्लैक कार्बन एवं अन्य ज़हरीले कणों से बना यह विषैला धुन्ध रूपी बादल हमारी जलवायु पर विपरीत प्रभाव डालती है.

४). रासायनिक धुन्ध– इस प्रकार का धुन्ध वायुमंडल में धूप, नाइट्रोजन ऑक्साइड्स और वाष्पशील कार्बनिक यौगिको के रासायनिक अभिक्रियाओं से बनता है. इसीलिए इसे सेकेंडरी या गौण प्रदूषक भी कहते हैं जैसे की PAN, ओजोन इत्यादि. जबकि प्राथमिक प्रदूषक वे होते हैं जो सीधे ही किसी स्रोत से उत्सर्जित होते हैं जैसे की CO, NOx, SOx, VOCs इत्यादि. इस प्रकार के रसायन प्रायः उच्च प्रतिक्रियाशील और आक्सीकारक होते हैं. रासायनिक धुन्ध प्रायः एल्डिहाइड, नाइट्रिक ऑक्साइड्स, VOCs, ज़मीनी स्तर की ओजोन एवं PAN के हानिकारक मिश्रण से बनती है.  इसीलिए रासायनिक धुन्ध आधुनिक औद्योगीकरण की प्रमुख समस्याओं में से एक है. अधिकांशतयः यह गर्म एवं शुष्क जलवायु वाले शहरों में सामान्य है जहाँ मोटर वाहनों की संख्या बहुत ज्यादा है.

 

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चित्र संख्या-२. रासायनिक धुन्ध का पर्यावरण में बनने की प्रक्रिया.

५) प्राकृतिक स्रोत– ज्वालामुखी विस्फोट से निकलने वाली गैसों के साथ निकले कण भी धुन्ध निर्माण में अहम् भूमिका निभाते हैं. किन्तु ज्वालामुखी विस्फोट के परिणाम से बनी इस धुन्ध को एक प्राकृतिक घटना के रूप में  वोग (VOG) कहते हैं. पौधों से निकलने वाले विभिन्न प्रकार के कार्बनिक यौगिक भी धुन्ध के बनने में सहायक होते हैं जैसे की टर्पींस (terpenes), रेडियोकार्बन, इत्यादि.

काली  धुन्ध बनने के कारण

धुन्ध प्रायः अत्यधिक ट्रैफिक वाले गर्म क्षेत्रों (उच्च ताप एवं तेज धूप) में शांत वातावरण वाली परिस्थितियों में बनता है. जब धूप से आने वाली गर्मी इन कणों के संपर्क में आती है तो वायुमंडल में एक कला से मिश्रण बनाती है जिसे काली धुन्ध कहते है. काली धुन्ध केवल अधिक प्रदूषित क्षेत्रों में ही पाई जाती है. काली धुन्ध के बनने में कोयला, डीजल वाहन एवं जैविक इंधनों से निकलने वाला धुआं प्रमुख रूप से सहायक होता है. इनसे निकलने वाली कालिख, ब्लैक कार्बन, SO2 एवं अन्य प्रदूषक शांत वातावरण में वायुमंडल के निचले  स्तर पर ही रुके रहते हैं. वायुमंडल में तुलनात्मक रूप से तेज गति की हवा के अभाव में इनका प्रसार रुक जाता है और किसी विशेष क्षेत्र में काला एवं धुंधला सा स्तर बन जाता है. साधारणतयः यह स्तर जमीन से ऊपर क्षोभमंडल में २ या ३ किलोमीटर से नीचे पाया जाता है. सर्दियों में मंद हवा और शांत मौसम में इंधनों के अत्यधिक दहन से निकलने वाला धुआं और कुहरा हवा में नीचे की तरफ रुका रहता है जो हमारे दैनिक जीवन में स्वास्थ्य पर बहुत गहरा प्रभाव डालती है और कई तरह से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती है.

तापमान और वायु की गति, काली धुन्ध बनने के दो महत्वपूर्ण घटक हैं. तापमान व्युत्क्रमण (Temperature inversion) वातावरण की वह स्थिति है जब गर्म हवा ऊपर ना उठकर जमीन के पास रुकी रहती है. एसी परिस्थिति में धुन्ध कई दिनों तक एक जगह पर हवा में ही नीचे की ओर फंसी रहती है.

किसी भी क्षेत्र की भौगोलिक संरचना और जलवायु भी धुन्ध के बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. जैसे की खाड़ी या घाटी क्षेत्र, जो पहाडों से घिरे होते हैं, वायु के परिसंचरण को रोकते हैं. अधिक जनसँख्या वाले एसे शहरी क्षेत्रों में वायु प्रदूषण कई दिनों तक रहता है जो धुन्ध के बनने में अहम् भूमिका निभाता है. गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में प्रायः वायुमंडल के उपरी हिस्से की हवा अधिक गरम हो जाने से भी नीचे की वायु का अधोलम्ब परिसंचरण रुक जाता है, और विभिन्न प्रकार के दहनों से निकलने वाले कण नीचे ही धुन्ध वाली स्थिति उत्पन्न कर देते हैं.

शहरों में गगनचुम्बी इमारतें, संकरी गलियां और शहरीकरण के लिए बढ़ते हुए वनोन्मूलन भी वायु प्रदूषण के फलस्वरूप होने वाली ऐसी घटनाओं के महत्पूर्ण घटक होते हैं. इंधनों का अनियंत्रित उपयोग भी अधिक जनसँख्या वाले क्षेत्रों में काली धुन्ध के निर्माण को बढाता है. जैविक इंधनों और डीजल वाहनों से निकलने वाला काला धुआं धुन्ध की तीव्रता और उससे होने वाले हानिकारक दुष्परिणामों को बढाता है.

काली धुन्ध के प्रभाव

धुन्ध मानव, जन्तुओं, पौधों और पर्यावरण सभी पर हानिकारक प्रभाव डालता है. मानव स्वास्थ और जलवायु पर धुन्ध का सबसे गहरा असर होता है.

स्वास्थ सम्बन्धी दुष्प्रभाव- धुन्ध दुनिया भर के कई शहरों की गंभीर समस्या है जो लगातार मानव स्वास्थ पर गहरा प्रभाव डाल रही है. प्रदूषण से निकलने वाले SO2, NOx, CO, जमीनी स्तर की ओजोन, इत्यादि वरिष्ठ नागरिकों, बच्चों, साँस और हृदय रोगियों पर बहुत हानिकारक प्रभाव डालते हैं और विभिन्न बीमारियों को जन्म देते हैं जैसे की अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, वातस्फीति (emphysema) आदि. कई दिन तक ऐसे वातावरण में सांस लेने से श्वांस मार्ग दर्द और खांसी बढ़ने लगती है और फेफड़ो की काम करने क क्षमता पर विपरीत प्रभाव डालती है. हानिकारक यौगिक, जैसे NOx, PAN, ओजोन और ब्लैक कार्बन, आँख और नाक में जलन पैदा कर देते हैं और नाक और गले की सुरक्षात्मक झिल्ली को सुखा देते हैं जिसके कारण शरीर की संक्रमण और बीमारियों से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है. धुन्ध के दौरान अस्पतालों में सांस सम्बन्धी बीमारियों से दाखिल होने वाले लोगों और इनसे होने वाली मृत्युओं की संख्या प्रायः बढ़ जाती है.

ओंटारियो मेडिकल एसोसिएसन के अनुसार, प्रान्त में हर साल लगभग ९५०० समय से पहले होने वाली मौतों के लिए धुन्ध जिम्मेदार है. अमेरिकन कैंसर सोसायटी के २० सालों के एक अध्ययन में पाया गया की लगातार कई वर्षो तक प्रदूषित हवा में रहने वाले व्यक्तियों में अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा सांस सम्बन्धी बीमारियों, कैंसर एवं अकाल मृत्यु का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.

एक शोध के अनुसार कैलिफोर्निया के सैन जोकिन घाटी क्षेत्र में १९९७ से २००६ के बीच ८०६ महिलाएं, जिनके बच्चों में जन्म दोष था, और ८४९ महिलाएं, जिनके बच्चे स्वास्थ थे, में पाया गया कि न्यूरल ट्यूब से जुडी हुए दोष प्रमुख रूप से धुन्ध से जुड़े हैं. जन्मदोष के साथ पैदा हुए बच्चों में स्पाइनल कार्ड की विकृतियों और मस्तिष्क के अल्पविकस से जुडी हई बीमारियों का कारण धुन्ध ही है.

ग्लासगो में होने वाले शोधकर्ताओं की गणना के अनुसार वायु में काले धुएं में प्राति १० माइक्रोग्राम/घन मीटर  की वृद्धि सभी प्रकार की मृत्युदर में ०.९% की वृद्धि करता है और सांस सम्बन्धी मृत्युदर में ३.१% की वृद्धि करता है. यह भी पाया गया की काली धुन्ध का असर मानव स्वास्थ पे इसके होने के कई हफ्तों तक रहता है. उनका सुझाव है की नियमित निगरानी, वायु प्रदूषण के प्रबंधन, स्वास्थ प्रभाव आकलन और नीतियों में देर से होने वाले प्रभावों पर भी विचार रखना चाहिए और इससे उपायों के लिए उचित कार्यवाही की जानी चाहिए.

पौधों पर प्रभाव- धुन्ध से बनने वाली जमीनी स्तर की ओजोन पौधों की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है और फसलों को गंभीर क्षति पहुंचाती है. सोयाबीन, गेहूं, टमाटर, मूंगफली और कॉटन की फसल विशेस रूप से धुन्ध के संक्रमण से प्रभावित होती हैं. धुन्ध के प्रभाव से वातावरण में पौधों के जीवन पर भयावह असर होता है क्यूंकि धुन्ध युक्त हानिकारक माहौल में अनुकूलित होने के लिए वनस्पतियों को बहुत समय लगता है.

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चित्र संख्या-३. १ दिसंबर २०१५ में बीजिंग शहर की सड़को पे होने वाले काली धुन्ध का एक द्रश्य.

जलवायु सम्बन्धी प्रभाव– अत्यधिक प्रदूषण वाले किसी भी प्रकार की जलवायु के क्षेत्र में धुन्ध देखी जा सकती है. अधिक धूप और गर्मी वाले मौसम में, जो वायु के उपरी परिसंचरण को बाधित करती है, ये और भी बद्तर हो जाती है. हालाँकि पहाड़ों से घिरे घटी क्षेत्रों में ये विशेष रूप से पाए जाते हैं.  घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में भी अक्सर इसका प्रकोप पाया गया है.

धुन्ध के समय वायुमंडल की पारदर्शिता बहुत कम हो जाती है क्यूंकि हवा में तैरते एरोसौल्स प्रकाश को प्रेक्षक तक पहुँचने से पहले ही अवशोषित या बिखेर देते हैं (चित्र संख्या ३). स्थलीय फोटोग्राफी को, विशेष रूप से रिमोट सेंसिंग में, एरोसोल्ज से युक्त घने वातावरण बाधित करते हैं जिससे बहुत सी मौसम सम्बन्धी भविष्यवाणियो में अवरोध उत्पन्न करते हैं. धुन्ध के कणों द्वारा प्रकाश के बिखरने से विपरीत दृश्य साफ़ नहीं होते. इसीलिए धुन्ध के समय सूर्योदय और सूर्यास्त में अंतर बहुत साफ़ नहीं होता.

दहन से निकलने वाला ब्लैक कार्बन सूर्य की गर्मी को सोख के वायुमंडल गरम करता है. पहाड़ो पर ये कण बर्फ पर जमा होकर इसे और भी गाढ़ा कर देते हैं, और इस कारण अधिक गर्मी सोख कर बर्फ पिघलने लगती है, जिसके फलस्वरूप समुद्र का तल बढ़ रहा है. ब्लैक कार्बन, CO2 की तुलना में १०० से २००० गुना अधिक ग्लोबल वार्मिंग  की क्षमता रखता है. हालाँकि वायुमंडल में इसका जीवनकाल कुछ दिनों से लेकर कुछ हफ्तों तक ही होता है जबकि CO2 का जीवनकाल १०० वर्षों से भी अधिक होता है.

एशियाई भूरा बादल (Atmospheric Brown Cloud)

इसकी खोज UNEP के INDOEX (Indian Ocean Experiment) कार्यक्रम के दौरान की गयी थी. एशियाई भूरा बादल (ABC) वायु प्रदूषण से बनने वाला एक विशाल बादल है जिसका विस्तार दक्षिण एशिया के कई देशों में पाया जाता है. उपगृहों से प्राप्त तस्वीरों में यह विशेष रूप से उत्तरी हिन्द महासागर, भारत, पाकिस्तान और चाइना के ऊपर वायुमंडल में प्रदूषण से बनी लगभग ३ किलोमीटर मोटी परत के रूप में देखा जा सकता है (चित्र संख्या ४). उपगृह से प्राप्त तस्वीरों में यह दिसंबर से मार्च के बीच विशाल भूरे धब्बे के रूप में दिखता है.

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चित्र संख्या-४. दिसंबर २००१ में प्रदूषण से बने बादल पूर्वी भारत, बांग्लादेश और चाइना के ऊपर फैले हुए.

ABC दक्षिण एशियाई देशों के मानसून पर बहुत विपरीत प्रभाव डालता है. हवा में तैरने वाले कण जैसे ब्लैक कार्बन, सल्फेट, NOx इत्यादि सूर्य के प्रकाश को समुद्र की सतह तक नहीं पहुँचने देते जिसके कारण वायुमंडल में उचित मात्रा में भाप नही बनती और मानसून प्रभावित होता है. इस प्रक्रिया को ग्लोबल डिम्मिंग (Global Dimming) भी कहते हैं. परिणाम स्वरुप यह जल एवं खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा बनते हैं जिसके कारण गेहूं, चावल, सोयाबीन आदि फसलो की उपज में ह्रास भी पाया गया है. साथ ही साथ यह जलवायु सम्बन्धी कई अन्य अनियमितताओं को भी बढाता है.

निष्कर्ष

पिछले कई वर्षों में बढ़ते शहरीकरण और औद्योगीकरण से होने वाले वायु प्रदूषण से विभिन्न प्रकार के भयानक दुष्परिणाम सामने आये हैं. स्वास्थ सम्बन्धी बीमारियाँ, पौधों को हानि, ग्लोबल वार्मिंग, बढ़ता समुद्री तल और जलवायु पर होने वाले विपरीत प्रभावों से देश और दुनिया के कई देशों ने इसका प्रकोप झेला है. बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए कई देशों ने कड़े कदम उठाये हैं. अमेरिका ने करीब ब्लैक कार्बन के उत्सर्जन को लगभग दो गुने से भी कम कर दिया है. पिछले कई वर्षों में यूरोप के कई देशों ने प्रदूषण को चार गुना तक कम किया है. दक्षिण एशिया के कई देशों में घरों में गर्मी एवं खाना पकाने के लिए आज भी भारी मात्रा में जैविक इंधनों का उपयोग किया जाता है जो ब्लैक कार्बन का प्रमुख स्रोत हैं. स्वच्छ कुकिंग तकनीकों के इस्तेमाल से इसे कम किया जा सकता है, जैसे कि सोलर कुकिंग, बायोगैस प्लांट्स, बेहतर चूल्हे आदि. नवीकरणीय स्रोतों (Renewable Energy) को उर्जा के प्रमुख स्रोतों के रूप में लाने की पहल कई देशों ने की है जैसे कि सौर उर्जा, वायु उर्जा, जो प्रदूषण को कई गुना कम कर सकता है.