परितंत्र के प्रहरी-गिद्ध

                                                                        शेख़ हुसैन

अपने निकटवर्ती, चारों ओर के वातावरण को स्वच्छ और प्रदूषण-विहीन बनाए रखना मानव-मात्र की सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसा करना अत्यंत वांछनीय है अन्यथा परिणामस्वरूप् हम मानवों को ही नहीं, सभी प्रकार के प्राणियों को गम्भीर संक्रमक रोगों का सामना करना होगा। जैसा कि सर्वविदित है, सभी जीव अपने जीवन-यापन हेतु प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग करते है और इस प्रक्रिया में वर्ज्य पदार्थों को पृथ्वी पर जहां-तहां, बिना आच्छादन के ही छोड़ देते है जिसका निपटान गिद्ध-सम कुछ स्वच्छक/अपमार्जक (Scavengers) करते हैं। ध्यातव्य है कि जब भी किसी पालतू अथवा वन्य जानवर का मृत शरीर, गांवों की सीमा के बाहर अथवा राष्ट्रीय उद्यानों, वन्य जीव अभयारण्यो (wildlife sanctuaries), बाघ आरक्षण स्थलों (tiger reserves), क्षेपण भूमि (dumping grounds) आदि पर छोड़ दिया जाता है, तो गिद्ध अपनी तीव्र घ्राण-शक्ति द्वारा इसको ढूंढ़ लेते हैं, 10 से 100 तक के समूहों में, तत्काल वहां पहुंच जाते हैं एवं चन्द मिनटों में ही उसका मांस चट कर जाते हैं तथा बची हुई हड्डियों को वहीं छोड़ जाते हैं।

चित्र-1. हिमालय का गिद्ध

अभी एवं रिप्ले (1983) के अनुसार कुछ दशकों पूर्व तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में गिद्धों की 09 प्रजातियाँ वितरित थीं। इनमें प्रमुख थी श्वेत पीठधारी गिद्ध (जिप्स बेंगालेन्सिस –Gyps bengalensis), लम्बी चोंच वालें गिद्ध (जिप्स इंडिकस – Gyps indicus), पतली चोंचधारी गिद्ध (जिप्स टेन्यूरोस्ट्रिस – Gyps teneurostris), भारतीय ग्रिफन गिद्ध (जिप्स फल्वस –Gyps fulvus), मिश्र का गिद्ध (नियोफ्रोन पेरेनोप्टेरस) आदि। 1980 तक इनकी जनसंख्या भारत समेत अन्य दक्षिण एशियाई देशों जैसे नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका आदि में संख्या न्यून हो गयी थी। लेकिन 1990 के दशक में आयी इनकी जनसंख्या की कमी ने वैज्ञानिकों और प्रकृतिविदों को आश्चर्य ही नहीं उलझन में भी डाल दिया जिसके कारण प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों के अंतर्राष्टीय संघ (IUCN) ने जिप्स (Gyps) वंश की प्रजातियों को क्रांतिक रूप से (Critically) संकटापन्न पक्षी प्रजतियों की श्रेणी में रखा है जो विलोपन की ओर अग्रसर हैं। उनकी संख्या में ह्रास 2003-2004 तक जारी रहा जब इसका प्रमुख कारण खोजा जा सका और पाया गया के पशुओं को दी जाने वाली स्टीरोइड-विहीन, सूजन-निवारक (anti-inflammatory) औषधि, डाइक्लोफेनाक (Diclofenac) का उपयोग इसकी दोषी थी। यह संज्ञान प्रथमतः पाकिस्तान और फिर भारत में बोम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के वैज्ञानिक, डा. विभू प्रकाश एवं अन्य के शोध के आधार पर आया। चूंकि हमारे देश में चौपायों की संख्या बहुत है और उत्तरी भारत को ‘मवेशी पट्टी’ (Cattle Belt) के नाम से जाना जाता है विशेषतः राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश एवं बिहार जैसे राज्य जहाँ इनकी संख्या अत्यंत विशाल है। पशुओं द्वारा हल चलाना, दुग्ध उत्पादों की प्राप्ति, और कुछ राज्यों में मांस के लिए भी इन्हें पाला जाता है। जब भी यह पशु रोगी हो जाते हैं तो उन्हें दर्द-निवारक औषधि स्वास्थ्य लाभ के लिए पशु चिकित्सकों अथवा पशुपालकों द्वारा स्वयं ही दी जाती है ताकि यह शीघ्र से शीघ्र स्वस्थ हो जायं। प्रायः इसकी मात्रा इतनी अधिक होती है कि यह अवशेष (residue) के रूप में पशुओं के शरीर में बची रह जाती है। तदुपरांत इन पशुओं की लाशें नगर अथवा गांव के बाहरी क्षेत्रों में अवस्थित कूड़ाघरों पर फेंक दी जाती है जहां कुत्ते, कौए, और गिद्ध इनको अपना भोजन बनाते हैं। डाइक्लोफेनाक का अवशेष पशुओं के शरीर से पक्षियों के भोजन-तंत्र (food system) में प्रवेश कर जाता है। प्रथमतः यह उनकी वृक्कों (kidney) की कार्य क्षमता को प्रभावित करता है, फिर शरीर के अन्य अंगों को अंततः इनकी गर्दन नीचे की और झुक जाती है और शनैः शनैः मृत्यु हो जाती है। इस प्रकार डाइक्लोफेनाक भारत समेत अन्य दक्षिण एशियाई देशों में गिद्धों की जनसंख्या कम करने का प्रमुख कारक बनी। दूसरा कारण इनके भोजन की उपलब्धता में कमी होना है क्योंकि अधिकांश पालतू मवेशियों को वृद्ध होने पर कटघरों (slaughter house) में बेच दिया जाता है और इनका मांस गिद्धों के स्थान पर मानव द्वारा खाया जाता है। इसी प्रकार वन अधिकारियों ने भी जानवरों के अवैध वन्य जीव व्यापार पर रोक लगाने के क्रम में मृत वन्य जीवों को जलाना अथवा पृथ्वी में गड्ढे खोदकर गाढ़ना प्रारम्भ कर दिया है जिससे गिद्धों को इनका मांस उपलब्ध नहीं हो पाता। दूसरे अपेक्षाकृत कम महत्व के कारण बड़ी संख्या में संघन वनों से वन-वृक्षों का कटान, जिन पर प्रतिवर्ष गिद्ध अपने घोसले बनाते हैं। साथ ही इनकी जनन ऋतु में आदिवासी वन-वासी शहद, लाख, गोंद, पंखों आदि के एकत्रण के लिए इनके आवासों में विक्षोभ (disturbances) उत्पन्न कर देते हैं। फलतः जनन वाधित होता है। कुछ प्राकृतिक आपदाएं जैसे चक्रवात, तूफान भी इनकी मृत्यु का कारण बनते हैं।

चित्र-2. गिद्ध आरक्षण प्रजनन केन्द्र (छायाचित्र साभार : श्री संदीप)
भारत में गिद्धों के संरक्षण के प्रयास जहां एक ओर केन्द्र और राज्य सरकारें विविध स्तरों पर कार्य कर रही हैं वहीं कई गैर-सरकारी संगठन जैसे बोम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (बी.एन.एच.एस) भी इस ओर जुटी हैं। इस संस्था ने गिद्धों के लिए अपना प्रथम पालतू (captive) प्रजनन केन्द्र, वर्ष 2004 में हरियाणा के पिंजौर के निकट स्थापित किया था और तत्पश्चात असम, पश्चिमी बंगाल, एवं मध्य प्रदेश राज्यों में गिद्ध आरक्षी अंचलों (vulture safe zones) की स्थापना की गई। साथ ही झारखंड, गुजरात, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश में 100 कि.मी. गिद्ध आरक्षी अंचल सूचित (notify) किये गए हैं। संकटापन्न प्रजातियों की आरक्षण प्रयोगशाला (Laboratory for conservation of endangered species – LACONES), जो हैदराबाद स्थित कोशिकीय एवं आण्विक केन्द्र (CCMB) से सम्बद्ध है, में भी इनके प्रजनन की व्यवस्था की गयी है। केन्द्रीय प्राणि उद्यान प्राधिकरण (Central Zoo Authority) भारत सरकार ने हैदराबाद, जूनागढ़, नन्दन कानन में वाह्य-स्थाने (ex-situ) गिद्ध आरक्षण प्रजनन केन्द्रों की स्थापना की है (चित्र 3)।

चित्र-3. गिद्ध आरक्षण प्रजनन केन्द्र

सलीम अली सेन्टर फोर ऑरनिथोलोजी एंड नेचुरल हिस्ट्री, कोयम्बतूर (SACOON), गिद्धों के मांस में डाइक्लोफेनाक की मात्रा की जांच करता है। यह प्रयास गिद्धों पर शोध, पालतू प्रजनन इनके घोसलों के संरक्षण की ओर विशेष घ्यान केन्द्रित करते हैं। इनकी जनगणना भी नियमित रूप से की जाती है। सेव (सेविंग एशियांज वल्चर फ्रॉम एक्सटिंक्शन) कार्यक्रम के अंतर्गत इस प्रजाति के विलोपन से बचाने का प्रयास किया जा रहा है। भारतीय आयुर्विज्ञान समिति (Indian Medical Association) ने 2007 में एक अधिनियम द्वारा डाइक्लोफेनाक के उपयोग और बिक्री पर पूर्णतः प्रतिबन्ध लगा दिया है। नेपाल सरकार ने गिद्धों को स्वच्छ एवं अनुपचारित (untreated) मांस प्रदान करनेके लिए गिद्ध अल्पाहार गृहों (Vulture Restaurant) की स्थापना की है। यह परिकल्पना अब भारत में भी लागू की जा रही है।

white backed vulture

चित्र-4. सफ़ेद समर्थित गिद्ध (छायाचित्र साभार : श्री संदीप)

बोम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी अपने पालतू प्रजनित गिद्धों का प्रथम समूह वर्ष 2016 में मुक्त आकाश में विहंगम उड़ान हेतु छोडे़गी लेकिन इससे पूर्व हमें इस ओर आश्वस्त होना होगा कि हमारा पर्यावरण पूर्णतः डाईक्लोफेनीक विहीन हो चुका है। इसमें सभी को अपनी भूमिका निभानी होगी। ध्यातत्व है कि मानव ने वृद्धि और उन्नति की दौड़ में अपने साथ विकसित होने वाली कई प्रणियों और पादपों की प्रजातियों को विलोपन की ओर धकेल दिया है। हमें आशा है कि हमारे सामूहिक प्रयास सफल होंगे और हम एक बार फिर गिद्धों को सुदूर आकाश में उड़ता हुआ तथा स्वच्छक (scavengers) की भूमिका सम्पन्न करता हुआ देख पाऐंगे।

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चित्र 5: प्रजनन केंद्र उन्मुक्त विचरते गिद्ध (छायाचित्र साभार : श्री संदीप)

Shaikh Hussain

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